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TMC चुनाव चिन्ह: 1968 के आदेश का पैरा 15 क्या है, जिसके आधार पर आयोग ने ममता बनर्जी को दिया झटका

Election Symbols Reservation And Allotment Order 1968:  तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक रहीं ममता बनर्जी को चुनाव आयोग से बड़ा झटका लगा है. चुनाव आयोग ने टीएमसी के दोनों धड़ों के लिए पार्टी का चुनाव चिन्ह फ्रीज कर दिया है. यानी अब फूल और घास चुनाव चिन्ह कोई भी धड़ा इस्तेमाल नहीं कर पाएगा. इसके लिए चुनाव आयोग ने इलेक्शन सिंबल (रिजर्वेशन एंड एलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 के पैरा 15 का आधार बनाया है. आयोग के इस फैसले के बाद टीएमसी के दोनों गुट आगामी उपचुनावों में नए चुनाव चिन्ह के साथ उतरेंगे. राज्य में दो विधानसभा सीटों नंदीग्राम और रजीनगर में उपचुनाव होने वाले हैं. आयोग ने दोनों धड़ों से अपनी-अपनी पार्टी के लिए नए नाम और चुनाव चिन्ह लेने को कहा है.

क्या है इलेक्शन सिंबल (रिजर्वेशन एंड एलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968

चुनाव आयोग ने चुनाव में राजनीतिक दलों की पहचान और चुनाव चिन्हों के आवंटन के लिए इलेक्शन सिंबल (रिजर्वेशन एंड एलॉटमेंट) ऑर्डर, 1968 बनाया था. इसी आदेश में यह तय होता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल का चुनाव चिन्ह कौन इस्तेमाल कर सकता है और पार्टी के भीतर विवाद होने पर आयोग किस तरह फैसला करेगा.

इसी आदेश का पैरा 15 राजनीतिक दल में टूट या दो धड़ों के बीच पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर विवाद की स्थिति से जुड़ा है. इसमें कहा गया है कि अगर आयोग के पास ऐसी जानकारी आती है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो या उससे ज्यादा धड़े खुद को वही पार्टी बता रहे हैं, तो आयोग उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को देखकर फैसला कर सकता है कि इनमें से कौन-सा धड़ा उस मान्यता प्राप्त पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है या कोई भी नहीं.

इसके लिए आयोग को दोनों पक्षों को सुनना होता है. यानी पेरा 15 का मतलब सिर्फ चुनाव चिन्ह छीन लेना नहीं है. यह वह कानूनी व्यवस्था है जिसके तहत चुनाव आयोग किसी पार्टी के भीतर पैदा हुए नाम, संगठन और चुनाव चिन्ह के अधिकार के विवाद पर फैसला करता है. सुप्रीम कोर्ट भी 1971 के सादिक अली बनाम चुनाव आयोग मामले में पेरा 15 की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा था.

पैरा 15 में आखिर लिखा क्या है?

पैरा 15 का मूल प्रावधान कहता है कि जब आयोग इस बात से संतुष्ट हो कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के दो प्रतिद्वंद्वी धड़े खुद को वही पार्टी बता रहे हैं, तो आयोग उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने और संबंधित पक्षों को सुनने के बाद यह तय कर सकता है कि कौन-सा धड़ा उस मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के रूप में माना जाएगा या कोई भी धड़ा नहीं.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आयोग का यह फैसला दोनों प्रतिद्वंद्वी धड़ों पर बाध्यकारी होता है. यानी आसान भाषा में समझें तो पेरा 15 चुनाव आयोग को यह अधिकार देता है कि पार्टी के अंदर दो दावेदार खड़े होने पर वह तय करे कि पार्टी का असली राजनीतिक और चुनावी प्रतिनिधि कौन है. इसी के साथ यह तय होता है कि पार्टी के लिए आरक्षित चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा.

फिर इस बार चुनाव चिन्ह फ्रीज क्यों हुआ?

मौजूदा मामले में आयोग के सामने दोनों धड़ों ने टीएमसी के नाम और उसके आरक्षित फूल और घास चुनाव चिन्ह पर अपना दावा किया है. आयोग ने माना कि उसके सामने दो प्रतिद्वंद्वी समूह हैं और विवाद पर पेरा 15 के तहत अंतिम फैसला किया जाना अभी बाकी है. लेकिन समस्या यह है कि पश्चिम बंगाल की दो विधानसभा सीटों- नंदीग्राम और रजीनगर में 6 अक्टूबर को उपचुनाव होने हैं. पेरा 15 के तहत पूरी सुनवाई और अंतिम फैसला करने में समय लग सकता है. इसलिए आयोग ने फिलहाल अंतरिम व्यवस्था करते हुए दोनों धड़ों को टीएमसी का नाम और फूल-घास चुनाव चिन्ह इस्तेमाल करने से रोक दिया है.

यहां एक अहम बात समझनी होगी. चुनाव चिन्ह फ्रीज करने का मौजूदा आदेश अंतिम फैसला नहीं है. आयोग ने दोनों धड़ों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह चुनने को कहा है, जबकि पार्टी के नाम और मूल चुनाव चिन्ह पर अंतिम फैसला पेरा 15 की प्रक्रिया पूरी होने के बाद होगा.

टीएमसी के दोनों धड़ों में कौन-कौन?

चुनाव आयोग के मौजूदा अंतरिम आदेश में एक धड़े को ममता बनर्जी और दूसरे को अरूप रॉय के नेतृत्व वाला बताया गया है. कुछ मीडिया रिपोर्टों में बागी खेमे को रीताब्रत बनर्जी से भी जोड़ा गया है. दोनों पक्षों ने पार्टी के संगठन, अधिकृत प्रतिनिधियों, नाम और चुनाव चिन्ह पर अपना-अपना दावा पेश किया है. आयोग ने दोनों को 18 सितंबर सुबह 11 बजे तक तीन-तीन संभावित नाम और तीन-तीन मुक्त चुनाव चिन्ह पसंद के क्रम में देने को कहा है. इनमें से आयोग प्रत्येक धड़े के लिए एक नाम और चुनाव चिन्ह मंजूर कर सकता है.

ऐसा पहले भी हो चुका है

पेरा 15 कोई नया प्रावधान नहीं है. इसका इस्तेमाल पहले भी बड़े राजनीतिक दलों में टूट के दौरान हुआ है. सबसे चर्चित मामला 1969 में कांग्रेस के विभाजन का था. उस समय कांग्रेस के दो धड़े पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह पर दावा कर रहे थे. चुनाव आयोग ने पेरा 15 के तहत विवाद पर फैसला किया और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. 1971 में सुप्रीम कोर्ट ने सादिक अली मामले में माना कि पेरा 15 के तहत ऐसे विवाद को सुलझाने का अधिकार चुनाव आयोग के पास है. अदालत ने यह भी माना कि पार्टी के दो धड़ों के बीच चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद होने पर आयोग उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर फैसला कर सकता है.

यही वजह है कि टीएमसी का मौजूदा विवाद सिर्फ एक चुनाव चिन्ह का मामला नहीं है. असल लड़ाई इस बात की है कि चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम, संगठन और चुनावी पहचान पर किस धड़े का दावा स्वीकार होता है. फिलहाल आयोग ने अंतिम फैसला देने के बजाय दोनों पक्षों को बराबरी की स्थिति में रखते हुए उपचुनाव के लिए अलग नाम और चिन्ह देने का रास्ता चुना है.

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