जेन जी : भाजपा को धार अभी पैनी करनी होगी

पहले पंजाब विश्वविद्यालय और शनिवार को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) के चुनाव नतीजे आने के बाद भले ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आला नेताओं की धुकधुकी थम गई होगी लेकिन उनके लिए कॉकरोच जनता पार्टी के ध्वज तले निकली जेन जी को संभाले रखने में अब भी काफी और लगातार मशक्कत करनी होगी। इस चुनाव ने फिर यह तय किया कि चुनावों का नेरेटिव (आख्यान) कुछ बड़ी घटनाओं पर ही ज्यादा आश्रित होता है। दिल्ली में छात्रों के इलाके में एक भवन का गिरना इतना बड़ा मुद्दा बना देगा, यह राजनीतिक दलों को भी तत्काल समझ में नहीं आया। डूसू के चुनाव सिर पर होने के कारण राजनीतिक दलों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाने शुरू किए और रेखा गुप्ता की सरकार को 10 हजार छात्रों के लिए हॉस्टल बनाने की घोषणा करनी पड़ी और शायद डिलीवरी के अच्छे रिकॉर्ड की वजह से छात्रों ने इस वायदे पर भरोसा भी कर लिया।
यूं तो कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद हर छोटा-बड़ा नेता हैलो-हाय में जुट गया है और उनके मुद्दों को लेकर तमाम रणनीतियां बन रही हैं। नौकरियों की ताबड़तोड़ घोषणाएं हो रही हैं और साथ ही उनको कुछ सरकारें जमीन पर लागू भी करने में सफल दिख रही हैं। पेपरलीक से जन्मे इस उबाल में अब यह सिलसिला फिलहाल तो नहीं दिख रहा है और इसके लिए न्यायपालिका के साथ ही केंद्र और राज्य की सरकारें भी फूंक-फूंक कर छाछ पी रही हैं। लेकिन डूसू के नतीजों में 4 में से 3 सीटों पर कब्जा करने के बाद और कांग्रेस के छात्र संगठन का सफाया करने के साथ भाजपा या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ए.बी.वी.पी.) के पक्ष में यह पक्का माना जा सकता है कि जेन जी पर उसकी पकड़ पक्की हो गई है।
यह सही है कि कॉकरोच आंदोलन के बाद भाजपा बैकफुट पर आ गई थी और शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था। इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं को संभालने की एकतरफा कोशिश शुरू कर दी। रात 1 बजे युवाओं से वीडियो संवाद हुआ। उन कई आयोजनों में प्रधानमंत्री गए, जहां उन्हें युवाओं से बात करने का मौका मिले। पूरे घर के बर्तन बदल डालूंगा की तर्ज पर काम हुए और यह संदेश देने की कोशिश की गई कि युवाओं के लिए कुछ तो तत्काल किया जा सकता है। हालात सुधर रहे थे तभी सत्य निकेतन की घटना ने और पोल-पट्टी खोल दी। इसे संभालने की कोशिश की।
दूसरी तरफ विपक्ष और खास तौर से राहुल गांधी की टीम ने सघन और तीखा हमला शुरू किया। ‘छात्रों की गूंज’ प्रोग्राम का फ्रेमवर्क कुछ ऐसा बनाया गया कि राहुल छात्रों-पीड़ितों से सीधी बात करें। इस बातचीत ने भी रंग दिखाना शुरू किया लेकिन यहां पर भी तथ्यों में कमजोरी के कारण इस कार्यक्रम के सामने ‘झूठ की गूंज’ आ गई और उसका असर थोड़ा हल्का हुआ। लेकिन असली गूंज तो चुनावी नतीजे ही बताते हैं। डूसू चुनावों में ए.बी.वी.पी. की विपरीत परिस्थितियों में बड़ी जीत है, इसमें कोई शक नहीं है, खास तौर से तब जब 2 महीने पहले ही चले आंदोलन ने सत्तारूढ़ दल के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया था। लेकिन इस जीत के साथ छात्रों की इस गूंज को ज्यादा आवाज मिली कि कांग्रेस या फिर उसके छात्र संगठन को मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली।
हालांकि अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पद ए.बी.वी.पी. के कब्जे में जरूर आ गए हैं लेकिन यदि पिछले वर्ष के आंकड़ों और जीत के अंतर को देखा जाए तो साफ नजर आएगा कि कैंपस में ए.बी.वी.पी. का दबदबा कम हुआ है। पिछले साल यानी 2025 में ए.बी.वी.पी. के आर्यन मान ने 16,196 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी । इस बार ए.बी.वी.पी. के यश डबाश चुनाव तो जीत गए लेकिन उन्होंने एन.एस.यू.आई. के विजय शंकर मीणा को केवल 2,053 वोटों से हराया। इसी तरह इस बार ए.बी.वी.पी. के लिए सबसे बड़ा झटका उपाध्यक्ष का पद रहा। विद्यार्थी परिषद को बुरी हार का सामना करना पड़ा, वह भी एक निर्दलीय से। निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने 30,634 वोट हासिल कर ए.बी.वी.पी. के ईशु मौर्य को लगभग 13,724 वोटों के भारी अंतर से शिकस्त दी। दीपांशु ने अपना पूरा प्रचार अभियान बड़े रोचक और इनोवेटिव तरीके से चलाया। उन्होंने पूरे प्रचार में चप्पल नहीं पहनी और बार-बार कहा कि हॉस्टल की समस्या को हल कराना उनकी प्राथमिकता है।
संयुक्त सचिव पद पर भी इस बार ए.बी.वी.पी. के लक्ष्य राज सिंह को बेहद कड़ी टक्कर मिली। वह सिर्फ 837 वोटों के बारीक अंतर से ही जीत दर्ज कर पाए। यहां तो उन्हें समाजवादी छात्र सभा के विशेष यादव (15,778 वोट) और एन.एस.यू.आई. के गोपाल चौधरी (15,206 वोट) से त्रिकोणीय मुकाबले में कड़ी चुनौती मिली। यानी यदि विपक्ष के दोनों गुटों के वोट नहीं बंटते, तो संयुक्त सचिव का पद भी ए.बी.वी.पी. के हाथ से निकल सकता था। दरअसल इन सबकी वजह पिछले चुनाव भी हैं। पिछले 9 चुनावों में ए.बी.वी.पी. के पैनल ने 6 बार बहुमत से जीत हासिल की। छह बार ए.बी.वी.पी. को 3-3 सीटों पर जीत हासिल हुई। लेकिन हॉस्टल की कमी, फीस वृद्धि और इंफ्रास्ट्रचर के मुद्दों को लेकर लाचारी बनी रही।
फिर इधर जेन जी के आंदोलन के बाद पेपरलीक और नौकरी संकट ने इन मुद्दों में और आग लगाई। भले ही कांग्रेस की छात्र इकाई एन.एस.यू.आई. कोई सीट नहीं जीत पाई लेकिन उनके अध्यक्ष पद के उम्मीदवार ने ए.बी.वी.पी. को आखिरी राऊंड तक कड़ी टक्कर दी। साथ ही वामपंथी संगठनों और क्षेत्रीय दलों ने भी ए.बी.वी.पी. के कोर वोट बैंक में सेंध लगाई। इस तरह भले ही ए.बी.वी.पी. के लिए 2026 के डूसू चुनाव परिणाम काफी कुछ बयां करते हैं। संगठन ने संगठनात्मक मजबूती और कोर वोट बैंक के कारण सत्ता तो बचा ली लेकिन जीत का घटता माॢजन और उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय की बड़ी जीत यह साफ दर्शाती है कि कैंपस की राजनीति में अब ए.बी.वी.पी. का एकछत्र दबदबा उतना मजबूत नहीं रहा। वह भी तब, जब केंद्र में भाजपा की सरकार है और राज्य में भी बहुमत से सरकार। दिल्ली के सभी सांसद उसके हैं।
भाजपा के लिए यह चुनाव बहुत महत्वपूर्ण था। इसमें पराजय पूरा नैरेटिव बदल सकती थी। यह उस दिशा में और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब केंद्र में भाजपा की सरकार है लेकिन सही दिशा के कारण भाजपा को यहां मिली सफलता उसकी दिशा को आगे बड़ा सकती है या यह कहना चाहिए कि उसे युवाओं के लिए अपनी धार और पैनी करनी होगी। खास तौर से तब, जब अगले 5-6 महीनों में उत्तर प्रदेश और पंजाब, उत्तराखंड समेत 5 राज्यों में चुनाव होने हैं और इनमें से 4 राज्यों में फिलहाल उनकी सरकारें हैं। लेकिन इस चुनाव के बाद कांग्रेस के लिए भी कई सबक हैं। कॉकरोच पार्टी की सफलता पर सवार होकर आप ज्यादा आगे नहीं जा सकते।-हम, देश के लोग अकु श्रीवास्तव




