संपादकीय

प्रधानमंत्री ‘अवैध’ कैसे?

देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और भारत सरकार अवैध, अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक कैसे हो सकती है? यदि ये अवैध हैं, तो समग्र राष्ट्र भी अवैध है। विश्व में भारत की मान्यता और पहचान भी अवैध है। प्रधानमंत्री के द्विपक्षीय संवाद, समझौते, नीतियां, घोषणाएं और अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलनों की सदस्यता और भागीदारी भी अवैध है। यदि राष्ट्र अवैध है, तो वे भी अवैध हैं, जिन्होंने ये अति गंभीर, शर्मनाक, कुंठित और देश-विरोधी आरोप चस्पां किए हैं। खासतौर पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े भी अवैध हैं, क्योंकि वह राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। इस तरह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी ‘अवैध सांसद’ हैं। यह सवाल केंद्रीय संसदीय मंत्री किरेन रिजीजू ने उठाया है। यदि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और उनके प्रतिनिधित्व वाली भारत सरकार अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक है, तो फिर संसद भी अवैध है, क्योंकि संसद में निर्वाचित सांसद ही आते हैं। यदि सांसद भी अवैध हैं, तो सदन में पारित किए गए कानून भी अवैध हैं। क्या देश अवैध रूप से चल रहा है? कांग्रेस को ऐसे बयान देने से पहले कुछ मंथन कर लेना चाहिए। एक बार फिर कांग्रेस और उसके कुछ सहयोगी, विपक्षी दलों को ईवीएम के इस्तेमाल पर आपत्ति और आशंकाएं हैं। खडग़े तो बहुत बुजुर्ग और अनुभवी नेता हैं। शायद उन्हें याद होगा कि ईवीएम का सर्वप्रथम प्रयोग 1982 में करके देखा गया था, जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं। 1999-मई, 2004 के दौरान प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में, अंतत:, लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं के लिए चुनाव ईवीएम के जरिए ही कराए गए। 2004 में जब कांग्रेस 145 संसदीय सीटें जीत कर लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और तत्कालीन भाजपा को 138 सीटों पर ही जीत नसीब हुई, अंतत: वाजपेयी सरकार को बाहर होना पड़ा।

कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए बना, गठबंधन की खिचड़ी पकाई गई, वामदलों के भी तब 61 सांसद थे। नतीजतन डा. मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। यूपीए अध्यक्ष होने के नाते सोनिया गांधी ‘सुपर प्रधानमंत्री’ बनीं। कांग्रेस नेतृत्व का यह कालखंड 10 साल तक रहा। यदि कांग्रेस को ईवीएम छोड़ कर बैलेट पेपर के ‘पाषाण-काल’ में लौटना था, तो उन 10 सालों में कानूनी व्यवस्था बदली जा सकती थी। संसद में प्रस्ताव पारित कराया जा सकता था कि मतदान ‘बैलेट पेपर’ के जरिए ही होंगे। जिस लोकसभा चुनाव के जनादेश के तौर पर भाजपा को ऐतिहासिक बहुमत हासिल हुआ था, तब केंद्र में यूपीए सरकार थी और चुनाव आयोग में तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह के द्वारा चयनित चेहरे ही थे। तब बैलेट पेपर ‘संवैधानिक’ क्यों नहीं लगा और ईवीएम के भीतर की गड़बडिय़ां क्यों सामने नहीं आईं? कांग्रेस को एक तथ्य स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि अब देश में चुनाव ईवीएम के जरिए ही होंगे। बैलेट पेपर को अतीत मान कर भूलना ही श्रेयस्कर होगा। यह दावानुमा कथन हम चुनाव आयोग के भीतरी सूत्रों के सौजन्य से कर रहे हैं। यदि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) विवादास्पद विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के कारण भारतीय लोकतंत्र के ‘खलनायक’ हैं, तो विपक्ष को जानकारी होनी चाहिए कि 2024 में लोकसभा चुनाव के वक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता सीईसी नहीं थे। वह इस संवैधानिक पद पर फरवरी, 2025 में नियुक्त किए गए थे। किसी एक संवैधानिक पदाधिकारी के कथित मनमाने फैसलों के कारण ऐसे बयान नहीं दिए जा सकते कि लोकतंत्र खत्म हो रहा है, संविधान को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है और तमाम चुनाव ‘अलोकतांत्रिक’ तरीके से कराए जा रहे हैं। लोकतंत्र भारतीय समाज की आत्मा है। संविधान ‘अरबपति और रिक्शेवाले’ को एक ही मत का समान अधिकार देता है। न लोकतंत्र और न ही संविधान का कोई बाल बांका कर सका है और न ही कोई उन्हें बर्बाद कर सकता है। देशवासियो! आप निश्चिंत रहें। यदि चुनाव वाकई ‘अलोकतांत्रिक’ तरीके से कराए जा रहे हैं, तो कांग्रेस की सभी सरकारें भी ‘असंवैधानिक’ हैं। खडग़े और राहुल गांधी अविलंब उनके इस्तीफे लें। बेशक सीईसी के निर्णयों से विपक्ष असंतुष्ट हो सकता है, आंदोलन भी खड़े कर सकता है, राष्ट्रपति को गुहार लगा सकता है, लेकिन देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और समूची सरकार, संसद को ‘अवैध’ करार नहीं दे सकता। यह देश और उसके करीब 96 करोड़ मतदाताओं के जनादेश को गाली देना होगा।

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