स्वास्थ्य

जिंदगी पर भारी पड़ता मानसिक तनाव

आत्महत्या रोकने की शुरुआत बड़े सरकारी कार्यक्रमों से जितनी होती है, उतनी ही एक संवेदनशील परिवार, एक समझदार शिक्षक, एक सजग मित्र और एक ऐसे समाज से भी होती है जहां परेशानी छिपाने के बजाय साझा की जाती है…

भारत में आत्महत्या के आंकड़े केवल संख्याओं का बढ़ता हुआ ग्राफ नहीं हैं, बल्कि वे हमारे समाज के भीतर बढ़ते मानसिक दबाव, अकेलेपन, आर्थिक असुरक्षा, पारिवारिक तनाव और भावनात्मक संवाद की कमी की गंभीर तस्वीर भी सामने रखते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की नवीनतम उपलब्ध रिपोर्ट ‘एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया-2024’ के अनुसार वर्ष 2024 में देश में 170746 आत्महत्याएं दर्ज की गईं। यानी औसतन प्रतिदिन 468 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई। यह आंकड़ा इसलिए भी चिंता पैदा करता है क्योंकि इसके पीछे केवल व्यक्तिगत परिस्थितियां नहीं, बल्कि परिवार, शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और सामाजिक संबंधों से जुड़ी अनेक परतें दिखाई देती हैं। इस समस्या का सबसे संवेदनशील पक्ष युवाओं और विद्यार्थियों से जुड़ा है। 29 सितंबर 2026 को सामने आए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित राष्ट्रीय कार्यबल के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के प्रारंभिक निष्कर्षों ने उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

दो लाख 43 हजार से अधिक विद्यार्थियों के जवाबों पर आधारित इस सर्वेक्षण में करीब 15 प्रतिशत विद्यार्थियों ने बताया कि पिछले छह महीनों में वे कई सप्ताह तक अत्यधिक तनाव, परेशानी, उदासी या बेचैनी की स्थिति से गुजरे, जबकि करीब 9 प्रतिशत ने पिछले एक वर्ष में अक्सर या बहुत बार आत्महत्या के विचार आने की बात कही। लगभग 34 प्रतिशत विद्यार्थियों ने किसी न किसी स्तर पर परिसर में खुद को बाहरी व्यक्ति जैसा महसूस किया। करीब 32 प्रतिशत ने यह भी बताया कि उनके संस्थान में काउंसिलिंग की सुविधा उपलब्ध नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के राष्ट्रीय कार्यबल ने अपने अध्ययन में सामाजिक भेदभाव, परिसर में अलगाव की भावना, अकादमिक दबाव और संस्थागत सहायता की कमी जैसे पहलुओं पर भी ध्यान दिया है। हालांकि इस सर्वेक्षण के निष्कर्ष अभी प्रारंभिक हैं और इसे पूरे उच्च शिक्षा क्षेत्र की प्रतिनिधि तस्वीर नहीं माना जा सकता, फिर भी इतने बड़े सर्वेक्षण में सामने आए संकेतों को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। आत्महत्या को केवल मानसिक बीमारी का परिणाम मानना भी सही नहीं होगा। वर्ष 2024 के एनसीआरबी आंकड़ों के अनुसार बीमारी से जुड़ी 30617 आत्महत्याएं दर्ज हुईं। इनमें 14305 मामले मानसिक बीमारी से संबंधित थे, जो बीमारी के कारण हुई आत्महत्याओं का लगभग 47 प्रतिशत है। डाउन टू अर्थ और सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के विश्लेषण के अनुसार 2023 में मानसिक बीमारी से जुड़ी ऐसी मौतों की संख्या 13978 थी। 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मानसिक बीमारी, बीमारी-संबंधी आत्महत्याओं का प्रमुख कारण रही। हिमाचल प्रदेश भी इस चिंता से अछूता नहीं है। हिमाचल पुलिस के क्राइम रिव्यू-2024 के अनुसार प्रदेश में 2024 में 813 आत्महत्याएं दर्ज हुईं।

इनमें 564 पुरुष और 249 महिलाएं थीं। अकेले कांगड़ा जिले में 137 मामले दर्ज हुए, जो प्रदेश के जिलों में उल्लेखनीय संख्या है। यह आंकड़ा हमें यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि पहाड़ की शांत दिखाई देने वाली जिंदगी के भीतर भी कितने लोग ऐसी पीड़ा से गुजर रहे हैं, जिसे वे किसी से कह नहीं पाते। इस स्थिति में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। किसी परेशान व्यक्ति को तुरंत उपदेश देने के बजाय उसकी बात सुनना, उसके अनुभव को गंभीरता से लेना और जरूरत पडऩे पर विशेषज्ञ तक पहुंचाना जरूरी है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में केवल करियर काउंसलिंग नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक सहायता की नियमित व्यवस्था होनी चाहिए। शिक्षकों को भी ऐसे संकेत पहचानने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, क्योंकि कई बार विद्यार्थी अपने माता-पिता से पहले अपने शिक्षक के सामने अपनी परेशानी व्यक्त करता है। बढ़ती आत्महत्याओं और आत्मघाती विचारों का मुख्य इलाज पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सहायता, मनोचिकित्सा थेरैपी और उचित दवाओं का संयोजन है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, टेली मानस के माध्यम से 24 घंटे मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध है।

इसके लिए 14416 या 1800.89.14416 पर संपर्क किया जा सकता है। सेवा का उद्देश्य केवल फोन पर बातचीत तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरत पडऩे पर आगे की मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोडऩा भी है। आत्महत्या की रोकथाम का अर्थ केवल संकट के समय किसी व्यक्ति को बचाना नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक परिस्थितियां बनाना भी है जहां व्यक्ति अपनी परेशानी समय रहते साझा कर सके। हमें बच्चों को यह सिखाना होगा कि असफलता अंत नहीं है, युवाओं को यह भरोसा देना होगा कि रोजगार या परीक्षा में असफलता उनकी पूरी पहचान नहीं है और परिवारों को यह समझना होगा कि भावनाओं पर बातचीत कमजोरी नहीं, बल्कि संबंधों की मजबूती है। मीडिया की भूमिका भी अत्यंत संवेदनशील है। आत्महत्या की घटनाओं को सनसनी, रोमांच या विस्तृत विवरण के साथ प्रस्तुत करने के बजाय उसके सामाजिक संदर्भ, चेतावनी संकेतों, सहायता सेवाओं और रोकथाम के उपायों पर ध्यान देना चाहिए। किसी व्यक्ति की मृत्यु को खबर बनाना आसान है, लेकिन समाज में यह भरोसा पैदा करना कहीं अधिक जरूरी है कि संकट की घड़ी में मदद उपलब्ध है। आंकड़े हमें चेतावनी दे रहे हैं, लेकिन आंकड़े अकेले किसी की जिंदगी नहीं बचा सकते।

जिंदगी तब बचती है जब कोई समय पर पूछता है- ‘तुम ठीक हो?’ और जवाब सुनने के लिए सचमुच रुकता भी है। आत्महत्या रोकने की शुरुआत बड़े सरकारी कार्यक्रमों से जितनी होती है, उतनी ही एक संवेदनशील परिवार, एक समझदार शिक्षक, एक सजग मित्र और एक ऐसे समाज से भी होती है जहां परेशानी छिपाने के बजाय साझा करने को साहस माना जाए। हमें आत्महत्या के आंकड़ों को केवल बढ़ती संख्या के रूप में नहीं, बल्कि हर संख्या के पीछे मौजूद एक अधूरी जिंदगी, एक परिवार की पीड़ा और एक ऐसी संभावना के रूप में देखना होगा जिसे समय पर सहायता देकर बचाया जा सकता है।-अनुज आचार्य

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