स्त्री की आजादी पर पहरा क्यों, सुरक्षा के नाम पर कब तक रहेगी कैद?

जब हम स्त्री की अस्मिता के संघर्ष पर गौर करते हैं, तो सदियों की यात्रा आंखों के सामने दौड़ जाती है कि कैसे सुनियोजित ढंग से यह तय किया गया कि महिलाओं को समाज में कैसे रहना है, कैसे बोलना है और कैसे उठना-बैठना है। धीरे-धीरे समय ने करवट ली और समाज में कई बदलाव हुए। पढ़े-लिखे घरों में महिलाओं को उचित सम्मान मिलने लगा और कुछ हद तक बराबरी का दर्जा भी।
आजादी के बाद स्थितियां और बदलीं, लेकिन एक मामले में चीजें यथावत रहीं-वह था पुरुष का नियंत्रण। यह पितृसत्तात्मक समाज के बदलाव का दौर था, जिसमें घर के मुखिया ने रक्षा का दायित्व ले रखा था। एक पिता के तौर पर अपनी पुत्रियों को समाज की कुदृष्टि से बचाने का दायित्व पिता का था और समाज के धीमे बदलाव को देखते हुए घर एक तरह से किला बन गया था-एक ऐसा किला, जिसके अंदर स्त्रियां अपने आप को सुरक्षित मानती थीं।
हालांकि किले के बाहर की दुनिया उतनी ही असुरक्षित थी। स्कूल जाते वक्त कोई भी आहट पीछा किए जाने का एहसास दिलाती थी और हमेशा एक अनजाना भय बना रहता था। ऐसे में घर की चारदीवारी सबसे सुरक्षित स्थान लगती थी, कैद-ए-हयात की तरह। बाहर निकलते ही दुनिया उतनी ही बदसूरत दिखाई देती। आज के दौर में जब लड़कियां बाहर आई हैं और अपनी आवाज उठा रही हैं, तो इस बात पर गौर करना जरूरी है कि वे उन्हीं औजारों को लेकर बाहर आई हैं, जिनसे उन्हें कैद करने की साजिश की गई थी। पुरुषों को लड़कियों द्वारा लगाए गए नारों पर बहुत आपत्ति है। बहुत-से सवाल उठ रहे हैं कि क्या पिता और भाई पुरुष नहीं हैं?
यह सच है कि लड़कियों के लिए उनके पिता और भाई केवल पुरुष नहीं हैं, बल्कि वे उनके संरक्षक और आदर्श हैं। उनमें पुरुष की वह दृष्टि नहीं होती, जो स्त्री को वस्तु की तरह देखती है। वे अपनी बेटी या बहन से पुरुष बनकर नहीं, एक भीगी हुई संवेदना और स्नेह की दृष्टि से मिलते हैं। इसलिए इन नारों को यह कहकर खारिज करना कि ये सभी पुरुषों के बारे में हैं, उचित नहीं होगा। ये उन पुरुषों की बात करते हैं, जो लड़कियों को छेड़ते हैं और उनके सम्मान को ठेस पहुंचाते हैं, जो महिलाओं को सामान की तरह तौलते हैं, जो बलात्कार करते हैं-कभी भाषा के स्तर पर तो कभी शरीर के स्तर पर।
एक स्त्री जब अपनी कैद को खुद की सुरक्षा समझने लगे, किसी पुरुष द्वारा न पीटे जाने को अपना सौभाग्य समझने लगे, तो उस समाज में उसकी स्थिति का आकलन करना मुश्किल नहीं है। सवाल है कि यह आवाज क्यों उठी? क्या यह एक दिन का मामला है? अगर यह केवल एक बलात्कार का मामला होता, तो विरोध में बैठी महिलाएं कभी सड़क से उठ नहीं पातीं। यह आवाज उस घुटन की है, जो वर्षों से पुरुषों के भय के कारण भीतर दबती रही है। किसी का गलत तरीके से छूना, अपशब्द कह देना और अंत में बेहद व्यंग्यात्मक ढंग से क्षमा मांग लेना- क्या इतनी भर ही है किसी महिला की पीड़ा?
जिस देश में बलात्कार केवल शरीर से नहीं, भाषा से भी होता हो, उस देश में स्त्री सुरक्षित कैसे हो सकती है? जहां पढ़े-लिखे से लेकर अनपढ़ तक गालियों को अपना औजार मानते हों, किसी महिला को नीचा दिखाना हो, तो उसके चरित्र पर सवाल उठाया जाए और किसी पुरुष को नीचा दिखाना हो, तो उसके घर की महिला को निशाना बनाया जाए। यानी इन सबके केंद्र में स्त्री ही रहेगी। लड़ाई चाहे स्त्री और पुरुष के बीच हो, दो दोस्तों के बीच हो या दो पड़ोसियों के बीच-अपमान का माध्यम महिला को ही बनाया जाएगा।
हाल के दिनों में इस तरह के नारे पहली बार सुनने को मिल रहे हैं। नारों को ध्यान से समझा जाए, तो ज्यादातर नारे सामान्य जनजीवन से आए हैं। इनमें न आध्यात्मिकता का ध्यान रखा गया है, न संस्कार का, न सौंदर्य का और न ही किसी तरह की लाग-लपेट का। इनमें केवल लयात्मकता है-ऐसी लय जो चलती रहे, मगर मारक हो। लड़कियों की मांग है सिर्फ एक सामान्य जीवन। उन्हें देवी नहीं बनना है, उन्हें संस्कारों की अर्थी नहीं ढोनी है। उन्हें केवल एक सुरक्षित और सम्मानपूर्ण जीवन जीने का अधिकार चाहिए। एक जायदाद की तरह हर वक्त भाई और पिता की पहरेदारी नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए एक मुक्त और सुरक्षित जीवन, जो सहज, सामान्य और स्वाभाविक हो।
मौजूदा दौर की घटनाएं प्रेशर कुकर की सीटी की तरह हैं। कुकर की सीटी की आवाज तेज और कर्कश होती है, लेकिन किसी कारणवश वह सीटी बजनी बंद हो जाए, तो समझना चाहिए कि कुछ गड़बड़ है या होने वाला है। अगर प्रेशर वाल्व में खराबी आ जाए, तो सीटी तो नहीं बजेगी, बल्कि पूरा कुकर ही फट सकता है। भारतीय समाज में शिव और शक्ति के बीच का संतुलन ही अर्धनारीश्वर की कल्पना का आधार है। अगर यह संतुलन नष्ट हुआ, तो हमारे पौराणिक ग्रंथों में जिस प्रलय की कल्पना की गई है, वह कुछ और नहीं, बल्कि समाज की विशृंखलता के रूप में सामने आ सकता है। बेहतर यही है कि समाज इन नारों को प्रेशर कुकर की सीटी समझे और समय रहते उस संतुलन को कायम करे, जिसमें महिलाओं को उचित स्थान और पूरा मान-सम्मान मिले।




