कौन करेगा ‘रिजीम चेंज’

‘तख्तापलट’ लोकतंत्र की भाषा नहीं है। जनमत के जरिए सत्ताएं बाहर होती रही हैं और जनादेश प्राप्त दल या गठबंधन सत्तारूढ़ होते रहे हैं। भारत एक संप्रभु, गणतांत्रिक, लोकतांत्रिक, संवैधानिक राष्ट्र है। भारत में आज तक तख्तापलट नहीं किया जा सका। देश में सत्ता का हस्तांतरण एकदम सहज और सरल भाव के साथ हो जाता है। हम अब किसी मुगल बादशाह की सल्तनत का देश नहीं हैं। भारत बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका भी नहीं है और कभी हो भी नहीं सकता। इन देशों में एक निश्चित भीड़ ने विद्रोह किया और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोडऩा पड़ा। बांग्लादेश में तो 6 बार तख्तापलट किए जा चुके हैं। फिर भी इन देशों में नई सत्ता चुनाव के जरिए ही स्थापित हो पाई। हमारे देश में जो हुड़दंगी बांग्लादेश के ‘कट्टरपंथी विद्रोह’ से प्रेरित हैं, वे मुगालते में हैं और कठपुतलियों की तरह सक्रिय हैं। वे भारतीय सत्ता का ‘तिनका’ भी नहीं तोड़ सकते। भारत में 1977 से पहले कांग्रेस ही सत्ता में रहती थी, बेशक उसके टुकड़े होते रहते थे। आपातकाल के बाद 1977 में चुनाव हुए, तो पहली बार गैर-कांग्रेसी, जनता पार्टी की, सरकार बनी और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। तब वाकई ‘रिजीम चेंज’, यानी व्यवस्था-परिवर्तन, हुआ था, क्योंकि जनता पार्टी की सरकार मानसिक, वैचारिक, कार्य-प्रणाली के तौर पर भी गैर-कांग्रेसी थी, लिहाजा भारत सरकार में कई स्तरों पर व्यवस्थाएं बदली गईं। हालांकि वह राजनीतिक प्रयोग, अंतत:, नाकाम साबित हुआ। उसने निराश किया, वह विभाजित हो गया, अंतत: 1980 में इंदिरा गांधी सरकार की वापसी हुई। आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई सरीखे नेताओं को ‘सीआईए एजेंट’ तक करार दिया था। राममनोहर लोहिया और तत्कालीन जनसंघ के नेता नारे लगाया करते थे-‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।’
बहरहाल मौजूदा संदर्भ में प्रख्यात अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने बार-बार दोहरा कर बयान दिया है कि यह ‘रिजीम चेंज’, सत्ता-परिवर्तन की, लड़ाई है। हम युवाओं के नेतृत्व में ‘रिजीम चेंज’ करके रहेंगे। उन्होंने ऐसे ही नारे ‘अन्ना आंदोलन’ के दौरान भी लगाए थे। बेशक आम आदमी पार्टी की सरकार बनी, लेकिन प्रशांत सरीखों को बाहर खदेड़ दिया गया। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा का मानना है कि आपातकाल के बाद ‘रिजीम चेंज’ हुई थी। यह विपक्ष का ही दायित्व है कि वह चुनाव के जरिए सत्ता-परिवर्तन कराए। दावे और नारे कुछ उलझ रहे हैं। सत्ता और व्यवस्था-परिवर्तन में भेद नहीं किया जा रहा और भीड़ ‘मोदी की सत्ता’ को उखाड़ फेंकने की हुंकारें भर रही है। यदि समूचे विपक्ष की यही रणनीति है कि राजधानी दिल्ली और कुछ अन्य प्रमुख शहरों में भीड़ जुटा कर अराजकता फैलाई जाए, तो 2027 में ही उप्र, पंजाब समेत पांच राज्यों में चुनाव होने हैं। विपक्ष जोर लगाए, लामबंदियां बनाए और सत्ता-परिवर्तन के प्रयास करे। देश उन राज्यों के जनादेश देखना चाहेगा, लेकिन ‘रिजीम चेंज’ के कोई आसार नहीं हैं। तिलचट्टों और कथित वामपंथी हुड़दंगियों के जरिए भारत जैसे विशाल, विविध देश की सत्ता और व्यवस्था नहीं बदली जा सकती। उसकी ‘अरब स्प्रिंग’ से तुलना करना भी कुतर्क है। अक्सर शांत और सहज रहने वाले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर गंभीर आरोप मढ़े हैं कि वह अराजकता फैला कर देश में ‘आग’ लगाना चाहते हैं। उन्हें यह करने का कोई लाइसेंस नहीं मिला है। बहरहाल ‘रिजीम चेंज’ या सत्ता-परिवर्तन इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि 2029 तक का जनादेश और भरपूर बहुमत मोदी सरकार को हासिल है। ‘वोट चोरी’ या मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दे ‘दीर्घजीवी’ नहीं हैं, क्योंकि विपक्ष की मांगें ‘असंवैधानिक’ हैं। आप सीईसी को ‘सनातन खलनायक’ करार नहीं दे सकते। बेशक मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण में कई खामियां सामने आई हैं, हम भी ‘मताधिकार’ की निरंतर पैरवी करते रहे हैं, लेकिन अब चुनाव आयोग ‘विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण’ (एसएसआर) के जरिए 17 राज्यों में गलतियां सुधार रहा है।




