दिल्ली-NCR की हवा के लिए बड़ी राहत! हरियाणा के 80% किसान नहीं जलाएंगे पराली, 1588 किसानों के सर्वे में खुलासा

नई दिल्ली: हरियाणा में धान की पराली का प्रबंधन करने वाले किसानों के बीच सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है. खेतों से पराली हटाकर उसकी गांठें बनाने या पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल करने वाले हर 5 में से 4 किसानों ने 2026 में भी पराली नहीं जलाने वाले विकल्पों को अपनाने की इच्छा जताई है. यह जानकारी काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW) की ओर से 1588 किसानों के बीच किए गए एक नए स्वतंत्र सर्वेक्षण में सामने आई है.
सर्वेक्षण में शामिल प्रार्थना बोरा ने बताया
सर्वेक्षण में शामिल प्रार्थना बोरा ने लोकल 18 से खास बातचीत में बताया कि अध्ययन में पराली प्रबंधन को लेकर किसानों की बढ़ती रुचि सामने आई है. हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि पराली प्रबंधन से जुड़े भुगतान और प्रोत्साहन की व्यवस्था अभी शुरुआती दौर में है और अलग-अलग स्तरों पर बिखरी हुई है. ऐसे में किसानों को पराली नहीं जलाने के विकल्पों की ओर प्रोत्साहित करने के लिए एक बेहतर और व्यवस्थित भुगतान व्यवस्था विकसित करना जरूरी है.
बता दें कि पराली की गांठें बनाने वाले सिर्फ 7 प्रतिशत किसानों को खरीदारों से भुगतान मिल पाता है. उन्होंने बताया कि उत्तर भारत में पराली जलाने के मामलों की अधिकता वाले पखवाड़े की शुरुआत हो रही है. वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने 21 अक्टूबर को दिल्ली-एनसीआर में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान का पहला चरण लागू किया है, जिसे इस सीजन में पहली बार लागू किया गया है.
वहीं, दिल्ली सरकार का विंटर एक्शन प्लान 1 नवंबर से लागू होगा. पंजाब में 15 सितंबर से 27 अक्टूबर के बीच सैटेलाइट के जरिए आग की 717 घटनाएं दर्ज हुईं, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह संख्या 890 थी. अक्टूबर के आखिर और नवंबर की शुरुआत में अधिकतम मामले वाले दिनों में दिल्ली के प्रतिदिन के PM2.5 में पराली जलने का योगदान 40 प्रतिशत तक हो सकता है.
144 गांवों में किसानों का सर्वेक्षण किया गया
प्रार्थना बोरा ने बताया कि सीईईडब्ल्यू के पहले अध्ययन मिटिगेटिंग स्टबल बर्निंग इन हरियाणा के तहत जनवरी से मार्च 2026 के बीच 12 जिलों के 144 गांवों में किसानों का सर्वेक्षण किया गया, जहां 2018 से 2024 के बीच खरीफ सीजन में आग जलने की घटनाओं में से लगभग 92 प्रतिशत मामले सामने आए थे. पराली की गांठें बनाने या उसे चारे के रूप में इस्तेमाल करने वाले किसानों में से 80 प्रतिशत ने कहा कि वे 2026 में भी ऐसा ही करेंगे.
किसान अभी 3 तरीके अपना रहे हैं जैसे 39 प्रतिशत किसान फसल अवशेष को चारे के रूप में इस्तेमाल करते हैं. जबकि 38 प्रतिशत उसकी गांठें बनाते हैं और 32 प्रतिशत सुपर सीडर जैसी मशीनों से उसे मिट्टी में मिला देते हैं. इनमें कई किसान ऐसे भी हैं, जो पराली प्रबंधन के लिए एक से अधिक उपाय अपनाते हैं. सर्वेक्षण में शामिल किसानों में से सिर्फ 6 प्रतिशत किसानों ने पराली जलाने की बात मानी. 26 प्रतिशत किसानों ने अपने गांव में पराली जलाने की बात कही.
1200 रुपए का फायदा
एक्सपर्ट प्रार्थना बोरा ने बताया कि हरियाणा में करीब 80 प्रतिशत किसानों को पराली न जलाने पर 1,200 रुपये प्रति एकड़ की प्रोत्साहन राशि देने वाली पराली प्रोत्साहन योजना के बारे में जानकारी है. शोधकर्ताओं ने पाया कि समय पर भुगतान से भरोसा बना है लेकिन सिर्फ 42 प्रतिशत किसानों ने इसके लिए आवेदन किया और 57 प्रतिशत आवेदकों को भुगतान हुआ. इस दौरान कुरिंजी केमंथ, प्रोग्राम लीड व पहले अध्ययन की सह-लेखक ने बताया कि हरियाणा के किसान हमें बताते हैं कि वे इस साल भी पराली न जलाने वाले विकल्पों को ही अपनाएंगे.
इस दौरान मोहम्मद रफीउद्दीन, प्रोग्राम लीड व सैटेलाइट अध्ययन के सह-लेखक, सीईईडब्ल्यू ने कहा कि किसान पराली न जलाएं, इसमें मदद करने के लिए भारत ने हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया है और राज्यों को यह जानने की जरूरत है कि यह मदद कहां पर काम कर रही है. आग की घटनाओं की गिनती हमें बस यह बताती है कि कहां पर सैटेलाइट की मदद से आग दिखी है. एक साथ देखें तो दोनों अध्ययन फंड और आकलन की कमी की तरफ संकेत करते हैं. किसान पराली को खेतों से हटा रहे हैं, लेकिन बाजार अभी भी अधिकतर किसानों को पर्याप्त भुगतान नहीं करता है.




