ट्रंप की मध्यावधि हार

राष्ट्रपति टं्रप की मध्यावधि चुनावों में करारी हार हुई है। बेशक वह अमरीका के राष्ट्रपति बने रहेंगे, लेकिन उनका करीब दो साल का शेष कार्यकाल लुंज-पुंज ही साबित होगा। अमरीकी कांग्रेस (संसद) के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स को बहुमत हासिल हुआ है। अब टं्रप मनमर्जी, निरंकुश, सनकी, एकाधिकारवादी, हस्तक्षेपी, आक्रांता राष्ट्रपति के तौर पर काम नहीं कर सकेंगे। बल्कि उनके खिलाफ कई जांचें बिठाई जा सकती हैं। कई विवादास्पद परतें खुल सकती हैं। उनके परिवार की 19,000 करोड़ रुपए की कमाई और संपत्ति, क्रिप्टो कारोबार तथा 20,000 से अधिक स्टॉक डील्स को खंगाला जा सकता है। ईरान युद्ध पर खर्च और नुकसान आदि के यथार्थ सामने आ सकते हैं। अमरीकी जनता हैरान हो सकती है। उनके कारण जनता का जो मोहभंग होगा, उसका खामियाजा टं्रप की रिपब्लिकन पार्टी को झेलना पड़ेगा। पार्टी में टं्रप का विरोध इतना बढ़ सकता है कि उनके नेतृत्व को खारिज किया जा सकता है। विश्लेषण सामने आए हैं कि करीब 91 फीसदी अश्वेतों, करीब 70 फीसदी हिस्पैनिक और एशियाई, 59 फीसदी अन्य ने राष्ट्रपति टं्रप की पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ वोट दिए। 18-29 आयु वर्ग के युवाओं और एशियाई मूल (भारतवंशी भी शामिल) के हर 10 में से 7 मतदाताओं ने डेमोक्रेट्स के पक्ष में जनादेश दिया है। इस आधार पर आकलन किया जा सकता है कि राष्ट्रपति टं्रप के मध्यावधि कार्यकाल के प्रति जनमत कैसा है? जनता के बीच राष्ट्रपति की लोकप्रियता 31-32 फीसदी तक क्यों लुढक़ आई है? इसमें सिर्फ ईरान युद्ध ही बुनियादी कारण नहीं है। तेल-गैस, डीजल के बढ़े दाम, रोजमर्रा की वस्तुओं की महंगाई, हेल्थ केयर की व्यवस्था के प्रति राष्ट्रपति टं्रप के सख्त फैसले, टैरिफ को लेकर कारोबारियों और आम आदमी की परेशानियां, महंगाई आदि कुछ बेहद संवेदनशील मुद्दों के आधार पर अमरीकी जनता ने टं्रप के खिलाफ यह जनादेश दिया है।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी मान रहे हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध और महंगाई ही हमारी हार की मुख्य वजह रही हैं, लेकिन इस मध्यावधि जनादेश से राष्ट्रपति टं्रप ‘शक्तिहीन’ हो जाएंगे, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अमरीका के संविधान के अनुच्छेद 1 और 2 में राष्ट्रपति की शक्तियों का उल्लेख है। वह डेमोक्रेट्स के बहुमत वाली संसद में पारित बिलों पर ‘वीटो’ कर उन्हें खारिज कर सकते हैं। बेशक सीनेट का दो-तिहाई बहुमत ‘वीटो’ को भी बेअसर कर सकता है, लेकिन डेमोक्रेट्स के पास इतना बहुमत नहीं है। अब युद्ध के संदर्भ में राष्ट्रपति टं्रप मनमाना फैसला नहीं कर सकते। यदि युद्ध में सेना भेजी गई है, तो राष्ट्रपति को 48 घंटे में अमरीकी कांग्रेस (संसद) को रपट देनी होगी। सेना की वापसी के लिए राष्ट्रपति को 30 दिन की अवधि मिलेगी, यह भी उनकी शक्तियों में शामिल है, लेकिन फिलहाल युद्ध का बजट पारित कराना या बजट की राशि में वृद्धि कराना भी मुश्किल होगा। युद्ध मंत्री हेगसेथ ने ईरान युद्ध का अभी तक का खर्च 2.55 लाख करोड़ रुपए बताया है। इसकी जांच कराई जा सकती है। राष्ट्रपति इस मध्यावधि पराजय के लिए युद्ध मंत्री हेगसेथ को ‘बलि का बकरा’ बना सकते हैं। बहरहाल भारत के संदर्भ में यह जनादेश आसान और सरल नहीं है। टैरिफ पर कानून बन चुका है, लिहाजा राष्ट्रपति टं्रप कभी भी भारत पर टैरिफ थोप सकते हैं। व्यापार-समझौते का दबाव अब भी रहेगा। भारत में जीई एयरोस्पेस के जेट इंजन और उन्नत बख्तरबंद वाहनों के निर्माण का जो साझा करार हुआ था, संसद में दोनों दलों ने इसका समर्थन किया था, उसके क्रियान्वयन की गति धीमी पड़ सकती है। टं्रप विदेश नीति को पूरी तरह ‘लेन-देन’ पर आधारित ‘अमरीका फस्र्ट’ के नजरिए से देखते हैं। इसके मायने हैं कि उनका प्रशासन अमरीकी संरक्षणवाद को ज्यादा बढ़ावा दे सकता है। टं्रप व्यापार समझौते और रूस से तेल आयात करने सरीखे मुद्दों पर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे।




