संपादकीय

रोखठोक : दिवाला निकल गया, फिर भी दिवाली है!

राज्य समेत देश का भी वैचारिक दिवाला निकल गया है। पूर्व सेनाप्रमुख मनोज नरवणे की पुस्तक पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने अघोषित प्रतिबंध लगा दिया। इसी बीच, वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया मचाडो को नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा हुई है। यह तानाशाही के खिलाफ लड़ रहे दुनियाभर के कार्यकर्ताओं की जीत है।

चा हे कितना भी दिवाला निकल जाए, दिवाली तो होगी ही। दिवाली आएगी और जाएगी, लेकिन सवाल कभी खत्म नहीं होंगे। दिल्ली में मोदी-शाह और महाराष्ट्र में श्री. फडणवीस वगैरह लोगों ने राज्य का वैचारिक और अक्ल का कुल मिलाकर जो दिवाला निकाला है, वो धक्कादायक है। हमारे पूर्व सेनाप्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने आत्मचरित्र पर एक पुस्तक लिखी। यह पुस्तक एक साल से अधिक समय से प्रधानमंत्री कार्यालय में पड़ी हुई है। प्रधानमंत्री मोदी पुस्तक के प्रकाशन को मंजूरी देने को तैयार नहीं हैं। यह एक तरह से सेंसरशिप है। श्री. नरवणे ने पुस्तक में २०२० में हिदुस्थान और चीन के बीच हुए संघर्ष का सत्य पेश किया। इसलिए मोदी सरकार इस सत्य को दबाने की कोशिश कर रही है। यह सब तानाशाही राज में होना स्वाभाविक है। ऐसे तानाशाहों को वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया मचाडो के संघर्ष को देखना चाहिए। मारिया को शांति का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई। इस वजह से इस पुरस्कार का ही सम्मान हुआ। वेनेजुएला के तानाशाह राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की भी उसके देश में एक ‘गोदी मीडिया’ है ही और वहां की गोदी मीडिया ने मारिया की बदनामी का अभियान शुरू कर दिया है। उस देश में टीवी चैनलों पर मारिया एक विदेशी एजेंट हैं, देशद्रोही हैं, ऐसी चर्चाओं की लहर आ गई है। भारत में श्री. राहुल गांधी के साथ जो हुआ, वही मारिया मचाडो के साथ उनके देश में हुआ। तानाशाह निकोलस मादुरो ने मारिया की संसद की सदस्यता रद्द कर दी। उनके पीछे जांच एजेंसियों का सिलसिला लगा दिया। सैकड़ों झूठे मुकदमे लगा दिए। वेनेजुएला के सर्वोच्च न्यायालय ने तानाशाह के दबाव में मारिया को सजा सुनाई और उन्हें देशद्रोही घोषित कर दिया। फिर भी मारिया लड़ती रहीं। उन्होंने तानाशाह के खिलाफ लड़ने का एक नया तरीका निकाला और अब उन्हें उनके संघर्ष को सम्मानित करनेवाला ‘शांति’ का नोबेल पुरस्कार मिला है। दुनिया में तानाशाही राज में प्रसिद्धि का ढोल पीटनेवालों को कभी सम्मान नहीं मिलता, यह मारिया के नोबेल पुरस्कार ने दिखा दिया है।
मारिया को दिया गया नोबेल शांति पुरस्कार तानाशाही के खिलाफ लड़ने वाले सभी लोगों के लिए दिवाली का उपहार है।
अमीरों का क्लब
भारत जैसे देश में दिवाली कौन मनाए? भारत अमीरों को और भी अमीर बनाने वाला देश बन गया है। हर बड़ी सरकारी परियोजनाओं का ठेका सिर्फ एक ही व्यक्ति को मिलता है। उसका नाम है ‘अडानी’। स्वारगेट-कात्रज मेट्रो परियोजना का काम भी अडानी को ही मिला है। १,६४३.८८ करोड़ की निविदा मंजूर की गई है। अडानी की निविदा सबसे कम कीमत की थी। किसी और को आने ही नहीं दिया गया। पूरे भारत में अडानी और कुछ गिने-चुने उद्योगपतियों की इस तरह से दिवाली हो रही है। भारत अरबपतियों का नया अड्डा बनता जा रहा है। अरबपतियों के क्लब में मुकेश अंबानी पहले स्थान पर हैं। उनकी संपत्ति ९.५५ लाख करोड़ है। अभिनेता शाहरुख खान की संपत्ति १२,४९० करोड़ रुपए है और वो भी अब इस सुपर रिच के क्लब में शामिल हो गया है। अंबानी, अडानी, शशि नाडर, साइरस पूनावाला, कुमार मंगलम बिड़ला, दिलीप संघवी, अजीम प्रेमजी, गोपीचंद हिंदुजा, राधाकिशन दमानी, नीरज बजाज परिवार। १,६८७ परिवारों के पास भारत की आधी संपत्ति है। इनकी अमीरी से भारत के गरीबों को क्या लाभ है? देश के ८० करोड़ लोग आज भी सरकार द्वारा हर महीने दिए जाने वाले १० किलो राशन पर गुजारा कर रहे हैं। अंबानी, अडानी, बिड़ला और नाडर की संपत्ति बढ़ने से उनके जीवन में दिवाली नहीं आएगी। सोने की कीमत अब १ लाख ३० हजार तक पहुंच गई है। चांदी १ लाख ९४ हजार के शिखर पर पहुंच गई है। गरीबों को अब सोना-चांदी नहीं चाहिए। दो वक्त की रोटी और हाथों को काम मिले, इतनी ही उनकी अपेक्षा है। इसे पूरा करने के लिए ये १,६८७ अरबपति परिवार आखिर क्या करेंगे? खुद का आर्थिक साम्राज्य बढ़ाने के लिए उन्हें लगभग एक लाख मजदूरों की जरूरत होती है। यही हमारी देश सेवा है, ऐसा इन सभी को लगता है। दान-पुण्य का दिखावा करके महानता का तमगा हासिल करना यह देश के अमीरों का काम हो गया है। जब निर्धनता बढ़ती है, तो जीना दुश्वार हो जाता है और इससे आत्महत्याएं बढ़ जाती हैं। एक संस्कृत नाटक का नायक कहता है, ‘‘दरिद्रता और मौत इनमें से अगर एक को चुनना पड़े, तो मैं मौत को ही चुनूंगा। क्योंकि मौत में थोड़ा दुख है, लेकिन ‘दरिद्रता’ कभी न खत्म होने वाला दुख है।’’
दिवाली से पहले धनतेरस और फिर लक्ष्मीपूजन होता है। उस दिन निर्धन भी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। व्यक्ति को खूब प्रयास करना चाहिए, ज्ञान प्राप्त करके कड़ी मेहनत करनी चाहिए और धन अर्जित करना चाहिए। दुनिया में धन के बिना कुछ भी नहीं होता। धन की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। आखिरकार, हमारी संस्कृति ‘लक्ष्मीपूजन’ करने वाली है। वेदों में भी लक्ष्मी की स्तुति श्री देवी के रूप में की गई है। धन, वैभव और लक्ष्मी पाप से प्राप्त होती हैं, ऐसा नहीं है। ज्ञानसंपन्न और चरित्रसंपन्न भी धनवान बनते हैं। ऐसे धनवानों की दिवाली ही वैभवशाली है। मारिया मचाडो को मिला नोबेल पुरस्कार कई लोगों के लिए दिवाली जैसा ही है। हर बार लक्ष्मी ही क्यों? सरस्वती, शांति और उसके लिए संघर्ष से प्राप्त होनेवाले सुख में भी दिवाली ही है।

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