संपादकीय

क्या भारत प्रमुख अर्थव्यवस्था है?

प्रख्यात अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में कार्यकारी निदेशक के पद पर काम कर चुके हैं, लिहाजा उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था के जिन संकेतकों की व्याख्या की है, वे महज सरकार की आलोचना नहीं हैं, बल्कि बेहद गंभीर सवाल भी हैं। उन्होंने इस विरोधाभास को उठाया है कि भाजपा अपनी राजनीति के ‘चरमोत्कर्ष’ पर है। यकीनन बंगाल की चुनावी जीत ऐतिहासिक है, लेकिन अर्थव्यवस्था के मामले में वह हार रही है। देश की अर्थव्यवस्था कमजोर और निम्न है। इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती कि यह ‘निम्नतम’ श्रेणी में नहीं जाएगी। अर्थशास्त्री भल्ला के अनुसार, जीडीपी वृद्धि के लिहाज से भारत 9वें स्थान पर है। प्रति व्यक्ति जीडीपी विकास में 8वें स्थान पर है और डॉलर में प्रति व्यक्ति विकास के संदर्भ में 16वें स्थान पर है। बांग्लादेश 8.3 फीसदी सालाना प्रति व्यक्ति विकास में प्रथम स्थान पर है। इथियोपिया जैसा युद्धरत और धूप से जले हुए चेहरों का देश 7.2 फीसदी जीडीपी वृद्धि के साथ दूसरे स्थान पर है। अमरीकी डॉलर में भारत का प्रति व्यक्ति विकास 4.7 फीसदी है और देश 16वें स्थान पर है। डॉ. भल्ला के इस डाटा के आधार पर सवाल सहज है कि भारत एक ‘प्रमुख अर्थव्यवस्था’ है अथवा आज भी ‘नाजुक अर्थव्यवस्था’ वाली श्रेणी में है? प्रख्यात अर्थशास्त्री की बुनियादी चिंता निजी-विदेशी निवेश (औसतन 32 फीसदी) और बीते सात सालों से ‘रुपए’ के लगातार अवमूल्यन को लेकर है। निर्यात भी बहुत कम हो गया है। दूसरा विश्लेषण प्रो. संतोष मेहरोत्रा का है। वह भी अंतरराष्ट्रीय ख्याति के ‘विकासवादी अर्थशास्त्री’ हैं। 2009-14 के दौरान वह योजना आयोग में ‘अनुप्रयुक्त मानव संसाधन अनुसंधान संस्थान’ के महानिदेशक (भारत सरकार में सचिव पद के समकक्ष) रहे। आज भी ब्रिटेन, मॉस्को समेत कुछ विश्वविद्यालयों में अर्थशास्त्र के विजिटिंग प्रोफेसर हैं। प्रो. मेहरोत्रा ने शोधात्मक विश्लेषण किया है कि भारत में करीब 12.10 करोड़ युवा न तो पढ़ रहे हैं और न ही काम कर रहे हैं। उनमें से करीब 8 करोड़ युवा अपना रोजगार ‘कृषि’ बताते हैं, जो उनका पुश्तैनी काम होगा। इतना व्यापक, युवा श्रम बेकार जा रहा है, क्योंकि वे बेरोजगार हैं।

यह देश के लिए शर्मनाक और विडंबनापूर्ण स्थिति है। प्रो. मेहरोत्रा के मुताबिक, 2012-25 के दौरान बेरोजगारी दर ‘तिगुनी’ बढ़ चुकी है। सरकार कुछ भी दावे करती रहे। खुदरा महंगाई दर भी 5 फीसदी को पार कर चुकी है और अभी महंगाई तेजी से बढ़ेगी। यह देश की व्यवस्था की विडंबना है कि मौजूदा दौर में कामगार या दिहाड़ीदार अथवा स्वरोजगार में लगे लोगों की आमदनी नहीं बढ़ सकी है, तो ये तबके महंगाई का सामना कैसे कर पाएंगे? दरअसल अर्थव्यवस्था संबंधी विरोधाभास यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी अभी पांच देशों के प्रवास से लौटे हैं। इस दौरान भारत के साथ 57 करार किए गए हैं। प्रधानमंत्री 50 से अधिक वैश्विक सीईओ से भी मिले। आज यूरोपीय संघ के केंद्र में भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था है। इसका सबसे बढिय़ा उदाहरण है कि जनवरी, 2026 में भारत और यूरोपीय संघ में ‘मुक्त व्यापार समझौता’ किया गया। हस्ताक्षर भी किए गए। शीत युद्ध के कालखंड में ऐसा रुख नहीं था। पश्चिम के साथ भारत के अंतरंग, रणनीतिक, मधुर संबंध नहीं थे, क्योंकि हम तत्कालीन सोवियत संघ की रक्षा और आर्थिक नीतियों के अनुसार ही निर्णय लेते थे। आज भारत का निर्यात बाजार और यूरोप के साथ पूंजी, विकसित प्रौद्योगिकी, ग्रीन ऊर्जा, एआई, सेमीकंडक्टर चिप्स, रक्षा, बुनियादी ढांचे, सांस्कृतिक, खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, निवेश आदि क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारियों ने भारत को ‘धुरी’ बना दिया है। यदि यूरोपीय देशों ने भारत के साथ इतने करार किए हैं, तो भारत आर्थिक रूप से सक्षम होगा और एक विशालतम बाजार होगा! आज फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड जैसे देश और नॉर्डिक देश भी भारत के साथ अंतरंग और गहरे रणनीतिक संबंध बना रहे हैं, तो यह भारत की चौतरफा ताकत है। चीन से संभावित जोखिमों को कम करने के लिए भी यूरोप भारत को साझेदार बना रहा है। क्या भारत की कमजोर अर्थव्यवस्था के कारण ये रणनीतिक साझेदारियां संभव थीं? लिहाजा एक बार फिर प्रधानमंत्री को देश को संबोधित कर खुलासा करना चाहिए कि सच क्या हैं? भारत की दृष्टि से दूसरे देशों के साथ आर्थिक समझौते तभी लाभदायक माने जाएंगे, अगर निर्यात के बजाय आयात कम हो। निर्यात और आयात के बीच संतुलन पैदा करने की जरूरत है।

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