गंगा दशहरा की पावन कथा, जानें कैसे हुआ मां का पृथ्वी पर अवतरण

Ganga Dussehra 2026: गंगा दशहरा सनातन धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है. हिंदू पंचांग के अनुसार, यह पर्व हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है. शास्त्रों के अनुसार, इसी पावन दिन मां गंगा का स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, जिसे ‘गंगावतरण’ कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन गंगा नदी में स्नान करने और दान-पुण्य करने से व्यक्ति के कायिक, वाचिक और मानसिक सहित कुल 10 प्रकार के पापों का नाश होता है. इस दिन मां गंगा की पूजा के समय व्रत कथा का पाठ करना और सुनना अत्यंत शुभ माना जाता है. कहा जाता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सुख-शांति बनी रहती है.
पौराणिक व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में इक्ष्वाकु वंश के एक प्रतापी राजा थे, जिनका नाम सगर था. राजा सगर ने चक्रवर्ती सम्राट बनने की इच्छा से अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया. राजा सगर के साठ हजार पुत्र उस यज्ञ के घोड़े की रक्षा कर रहे थे.
राजा सगर के इस विशाल यज्ञ से देवराज इंद्र भयभीत हो गए. यज्ञ को भंग करने के उद्देश्य से इंद्र ने अवसर पाकर यज्ञीय अश्व को चुरा लिया और उसे पाताल लोक में कपिल मुनि के आश्रम के पास बांध दिया. उस समय कपिल मुनि गहरी तपस्या में लीन थे, इसलिए उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी.
सगर पुत्रों का अहंकार और कपिल मुनि का क्रोध
जब राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े की खोज करते हुए पाताल लोक में कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे, तो वहां घोड़े को बंधा देखकर उन्होंने मुनि को ही चोर समझ लिया. अहंकार में चूर सगर पुत्रों ने कपिल मुनि का अपमान करना शुरू कर दिया.
जैसे ही कपिल मुनि की ध्यान साधना भंग हुई, उन्होंने क्रोधित होकर अपनी आंखें खोलीं. मुनि की क्रोधाग्नि से राजा सगर के सभी साठ हजार पुत्र वहीं जलकर भस्म हो गए. जब राजा सगर को इस घटना का पता चला, तो वे अत्यंत दुखी हो गए.
भगीरथ की कठोर तपस्या
इस घटना के वर्षों बाद राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार का संकल्प लिया. उनके पूर्वजों के मोक्ष का एकमात्र उपाय स्वर्ग की पवित्र नदी गंगा का जल था. इसके लिए भगीरथ ने राजपाट त्याग दिया और हिमालय जाकर भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की.
भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें दर्शन दिए और मां गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिए तैयार हो गए.
मां गंगा की चेतावनी और महादेव की जटाएं
मां गंगा ने भगीरथ से कहा, “मैं पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हूं, लेकिन स्वर्ग से उतरते समय मेरा वेग इतना तीव्र होगा कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर पाएगी. मेरे इस प्रचंड वेग को केवल भगवान शिव ही संभाल सकते हैं.” यह सुनकर राजा भगीरथ ने भगवान शिव की कठोर आराधना की. भगीरथ की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने मां गंगा के वेग को अपनी जटाओं में धारण करने की सहमति दी. जब मां गंगा स्वर्ग से पृथ्वी पर उतरीं, तब भगवान शिव ने उन्हें अपनी जटाओं में समाहित कर लिया. बाद में भगीरथ की प्रार्थना पर शिव जी ने अपनी जटाओं से गंगा की एक धारा पृथ्वी पर प्रवाहित की.
पूर्वजों को मिला मोक्ष
राजा भगीरथ के पीछे-पीछे मां गंगा पाताल लोक में कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंचीं. जैसे ही मां गंगा के पवित्र जल ने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की भस्म को स्पर्श किया, उनकी आत्माओं को मोक्ष प्राप्त हो गया. भगीरथ के इसी अदम्य प्रयास और तपस्या के कारण मां गंगा का एक नाम ‘भागीरथी’ भी पड़ा.




