लेख

विभाजन विभीषिका, पंद्रह अगस्त

पाकिस्तान के लोग भी अब यह समझने लगे हैं कि अरब और तुर्क उनको अपने बराबर का मुसलमान नहीं समझते, बल्कि वे उन्हें अपना गुलाम ही मानते हैं। सैयद अपनी लडक़ी की शादी किसी बड़े से बड़े देसी मुसलमान से भी नहीं करेंगे। उनके लिए देसी मुसलमान एक प्रकार के अछूत हैं। देसी मुसलमानों की जड़ भारत में है, न कि अरब में। पाकिस्तान में बलोच, पश्तून और सिन्धी अब इसको जान गए हैं। भारत का देसी मुसलमान भी एटीएम के शिकंजे से निकलने के लिए चेतन हो गया है…

भारत के आधुनिक इतिहास में दो दिन महत्वपूर्ण हैं। चौदह अगस्त और पंद्रह अगस्त। पंद्रह अगस्त को ब्रिटेन ने भारत को अपने कब्जे से छोड़ दिया। उन्होंने सत्ता भारत के ही एक राजनीतिक दल कांग्रेस को सौंप दी थी। लेकिन यह सारा काम बिना शर्त नहीं हुआ था। कांग्रेस को सत्ता सौंपने से पहले ब्रिटेन ने यह शर्त लगा दी थी कि कांग्रेस बाकायदा एक प्रस्ताव पारित करे कि भारत को विभाजित कर दिया जाए। कांग्रेस दुविधा में थी। यदि भारत विभाजन का प्रस्ताव न पारित किया गया तो एक बार फिर जेलों में जाना पड़ेगा और आजादी की लड़ाई पच्चीस-तीस साल और लंबी चल सकती है। लेकिन शायद कांग्रेस का नेतृत्व अब जेल में जाने को तैयार नहीं था। कुछ विद्वानों ने समझाया भी। द्वितीय विश्व युद्ध ने हालात ऐसे बना दिए कि इंग्लैंड खुद खोखला हो गया। वह अब भारत पर अपना आधिपत्य आर्थिक कारणों से भी रख ही नहीं सकता। फिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने भारतीय सेना में जो विद्रोह की चिंगारी जला दी है, वह अब फैल रही है। लेकिन कांग्रेस का नेतृत्व अधीर हो गया था। उसने सबसे आसान रास्ता चुना। भारत विभाजन के पक्ष में प्रस्ताव पारित करो और सत्ता अपने हाथ में लो। भारत विभाजन के पक्ष में कांग्रेस द्वारा प्रस्ताव पारित करने के बाद भारत विभाजित भी हो गया और आजाद भी हो गया। शायद यही कारण था कि आजादी का जश्न आधी रात को शुरू हुआ। दिल्ली में जब जश्न मनाया जा रहा था तो भारत के ही कटे हुए हिस्से से, जिसे अब पाकिस्तान का नाम दिया गया था, लाखों भारतीय इधर को आ रहे थे। लेकिन केवल इधर को आ रहे थे, कहने से क्या काम चल सकता है?

इधर को आते-आते, कहा जाता है दस लाख हिंदू-सिख मारे गए। क्यों मारे गए थे? क्योंकि कांग्रेस ने भारत के विभाजन का प्रस्ताव पारित कर दिया था। इतिहास का यह अजीब विरोधाभास था कि एक साथ लाखों लोगों का रक्त बह रहा था और आजादी का जश्न भी मनाया जा रहा था। इतिहास में कभी-कभी ऐसा भी होता है। बहुत दशकों बाद देश की सरकार को यह ध्यान आया कि आजादी और भारत विभाजन दोनों कहीं न कहीं आपस में जुड़ी हुई हैं। अत: आजादी का जश्न मनाते समय भारत विभाजन विभीषिका को स्मरण करना और इस विभीषिका में मारे गए भारतीयों को श्रद्धांजलि अर्पित करना भी हमारा राष्ट्रीय धर्म है। शायद यही कारण है कि इक्कीसवीं शताब्दी में सरकार ने अपने इस राष्ट्रीय धर्म को निभाने का निर्णय किया। लेकिन भारत विभाजन विभीषिका पर चर्चा करते समय ध्यान रखना चाहिए कि ऐसे अवसरों पर यह मंथन भी किया जाता है कि विभाजन किन कारणों से हुआ और क्या इस विभाजन के बाद वे कारण समाप्त हो गए हैं? यदि विभाजन के कारण अब समाप्त हो गए हैं, तो क्या यह विभाजन समाप्ति की ओर पहला कदम है? चौदह और पंद्रह अगस्त के दिन चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है। मोटे तौर पर यही माना जाता है कि विभाजन का कारण यह था कि जिन्ना को यह वहम हो गया था या फिर अंग्रेजों ने उसको यह वहम बेच दिया था कि हिंदू-मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। लेकिन शायद असली कारण कुछ और था। अरब, तुर्क और मुगल (एटीएम) मूल के मुसलमानों को लगने लगा था कि पिछले पांच सौ सालों में हमने जिन हिंदुस्तानियों पर राज किया है, अंग्रेजों के चले जाने के बाद, हमें इन हिंदुस्तानियों के केवल साथ ही नहीं बैठना पड़ेगा, बल्कि शायद उनके राज में रहना पड़े। अरब मूल के सैयदों की तो यह सोच सोच कर ही नींद हराम हो रही थी। 1857 की आजादी की पहली लड़ाई में वे देख चुके थे कि भारत के हिंदू और देसी मुसलमान किस प्रकार कन्धे से कन्धा मिला कर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे। इसके परिणामस्वरूप अंग्रेज और एटीएम एक साथ ही चौकन्ने हो गए थे कि मामला हाथ से निकलता जा रहा है।

1857 की लड़ाई के बाद सैयद अहमद खान और मिर्जा गालिब ने भारत के देसी मुसलमानों को जी भर भर कर गालियां निकाली हैं कि इन ‘बदजातों’ ने अंग्रेजों के खिलाफ बंदूक उठाई। अंग्रेजों को लगा कि हिंदू-मुसलमान को अलग-अलग करना चाहिए और एटीएम को लगा कि यदि भारत आजाद हो गया तो हमारी औकात क्या रह जाएगी? एटीएम में भी अरब मूल के सैयदों की चिंता सबसे ज्यादा थी। लेकिन सैयदों की चिंता का एक दूसरा कारण भी था। भारत के मुसलमानों में एटीएम मूल के मुसलमानों की संख्या तो महज पांच प्रतिशत ही है। वे अब भारत की राजनीति को कैसे नियंत्रित कर सकते हैं? तब शायद अंग्रेजों ने जिन्ना, जो देसी मुसलमान था, को उसकी कीमत चुका कर खरीद लिया और उसे मुफ्त में सैयदों के हवाले कर दिया। भारत में ऐसे मुसलमानों, जो हिंदू से मुसलमान बने हैं और देसी मुसलमान, जो पसमांदा कहे जाते हैं, की संख्या 95 फीसदी है। अंग्रेजों ने सैयदों को समझा दिया कि अपने आगे इन देसी मुसलमानों को रखो और पीछे से नियंत्रण अपने हाथ में रखो। तब जिन्ना आगे-आगे दिखाई दे रहे थे और रस्सी सैयद खींच रहे थे। नारा लगा, हिंदू-मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते। पाकिस्तान बन गया। अंबेडकर भारत की जमीनी स्थिति को समझते थे। वे जानते थे कि इस विभाजन से जो विभीषिका पैदा होगी, उसमें लाखों लोग मारे जाएंगे। उन्होंने कांग्रेस को समझाया कि जब आपने मजहब के आधार पर विभाजन स्वीकार किया है तो मजहब के आधार पर ही शांतिपूर्ण तरीके से जनसंख्या परिवर्तन की व्यवस्था कर लो। लेकिन लार्ड माउंटबेटन ने नेहरु को पहले ही समझा रखा था कि आपने इस संकट काल में सेक्युलर का मुकुट धारण किए रखना है ताकि आपकी छवि बनी रहे। उस छवि ने दस लाख निर्दोष भारतीयों की बलि ले ली। पाकिस्तान बन गया। सैयदों को अब देसी मुसलमानों की जरूरत नहीं रही। जिन्ना तो कुछ महीनों में ही मर गए और पाकिस्तान ने उनकी बहन को जेल में डाल दिया। लेकिन विभाजन के लगभग आठ दशक बाद भी विभाजन के कारण दूर हो गए हैं? क्या हम एक कदम भी आगे बढ़े? सबसे पहला कदम तो यही है कि हमने पंद्रह अगस्त से एक दिन पहले भारत विभाजन विभीषिका को याद करना शुरू कर दिया है।

दूसरा, भारत और पाकिस्तान के देसी मुसलमानों ने समझना शुरू कर दिया है कि उनका सैयदों ने अपने हितों के लिए दुरुपयोग किया है। देसी मुसलमानों का शोषण एटीएम ने किया है। पाकिस्तान के लोग भी अब यह समझने लगे हैं कि अरब और तुर्क उनको अपने बराबर का मुसलमान नहीं समझते, बल्कि वे उन्हें अपना गुलाम ही मानते हैं। सैयद अपनी लडक़ी की शादी किसी बड़े से बड़े देसी मुसलमान से भी नहीं करेंगे। उनके लिए देसी मुसलमान एक प्रकार के अछूत हैं। देसी मुसलमानों की जड़ भारत में है, न कि अरब में। पाकिस्तान में बलोच, पश्तून और सिन्धी अब इसको जान गए हैं। भारत का देसी मुसलमान भी एटीएम के शिकंजे से निकलने के लिए चेतन हो गया है। जैसे जैसे यह चेतना बढ़ेगी, वैसे वैसे सैयदों और अंग्रेजों का ‘भारत विभाजन का संयुक्त षड्यंत्र’ सबके सामने आने लगेगा। विभाजन की मानसिक और भौगोलिक रेखा को समाप्त करना ही विभाजन के दस लाख बलिदानियों को श्रद्धांजलि होगी। इतिहास को भी उस दिन का इंतजार रहेगा। भारत आजाद हो गया, किंतु उसके लाखों नागरिकों को अपने खून से इसकी कीमत चुकानी पड़ी।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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