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गरीबों का पेट भरतीं दिल्ली की ‘अटल कैंटीनें’

अटल कैंटीनें दिल्ली सरकार की एक पहल है, जहां 5 रुपए प्रति व्यक्ति के हिसाब से भोजन उपलब्ध कराया जाता है। हजारों लोगों के लिए, अटल कैंटीनें पका हुआ भोजन प्राप्त करने का एक नियमित ठिकाना बन गई हैं, जिसके लिए उन्हें बहुत कम खर्च करना पड़ता है। दिसम्बर 2025 से, दिल्ली सरकार ने शहर भर में 100 स्थानों पर अटल कैंटीनें शुरू की हैं, जो प्रतिदिन लगभग 50,000 भोजन वितरित करती हैं। प्रत्येक कैंटीन की प्रतिदिन 1,000 भोजन उपलब्ध कराने की क्षमता है, जिसमें दोपहर का भोजन और रात का भोजन दोनों के लिए 500-500 भोजन शामिल हैं। 

100 कैंटीनों के संचालन का ठेका निविदा प्रक्रिया के माध्यम से 11 अलग-अलग कंपनियों या गैर-सरकारी संगठनों को दिया गया है। कंपनी प्रत्येक भोजन के लिए 30 रुपए शुल्क लेती है, जिसमें से वह व्यक्ति से 5 रुपए और सरकार से 25 वसूल करती है। 100 कैंटीनों को 5-5 के 20 समूहों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक समूह की कैंटीनों के लिए भोजन एक केंद्रीय कैंटीन में पकाया जाता है और अधिकारियों के अनुसार, विक्रेता को वहां से किसी और को भोजन की आपूर्ति करने की अनुमति नहीं है। पका हुआ भोजन फिर 20-30 लीटर के स्टील ड्रम या इंसुलेटेड कैसरोल में कैंटीनों में वितरित किया जाता है। 

पिछले साल 25 दिसम्बर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर योजना के शुभारंभ के अवसर पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा था कि सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दिल्ली में कोई भी भूखा न रहे। वैश्विक भूख सूचकांक रिपोर्ट में भारत 123 देशों में से 102वें स्थान पर है, जिसका स्कोर 25.8 है, जो इसे ‘गंभीर’ भूख की श्रेणी में रखता है। अधिकांश कैंटीनें झुग्गी-झोंपड़ी वाले इलाकों के पास ही बनी हैं लेकिन कुछ अस्पतालों, कॉलेजों और बस टर्मिनलों के पास स्थित हैं, जो विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को आकॢषत करती हैं-कूड़ा बीनने वाले, ऑटो रिक्शा चालक, डिलीवरी एजैंट, छात्र। प्रत्येक कैंटीन में हर भोजन के बाद दाल और  सब्जी  बदल जाती है। बारी-बारी से काली दाल, मसूर दाल, चना दाल, आलू और चना या आलू और टमाटर परोसे जाते हैं। अटल कैंटीनों में लोग अपनी प्लेटें फिर से भर सकते हैं। 

माइक्रो एजुकेशन एंड सोशल वैल्फेयर सोसाइटी, जो एक गैर-लाभकारी संस्था है और 10 अटल कैंटीन चलाती है,  के सलाहकार मुकेश कुमार अग्रवाल कहते हैं, ‘‘आनंद विहार जैसी कैंटीन के लिए, जहां दोपहर में लगभग 500 भोजन परोसे जाते हैं, हम लगभग 125 किलो दाल और सब्जी, 100 किलो चावल और 2,000 रोटियां बनाते हैं।’’ हर कैंटीन लगभग एक जैसी है, प्रत्येक में 6 मेज और 8 स्टूल हैं, सफेद टाइलों का फर्श है और धातु की छत है। कैंटीन के कर्मचारी शिकायत करते हैं कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती। एक कैंटीन में खाना परोसने वाली 40 वर्षीय महिला का कहना है कि उसे महीने में केवल 8,500 रुपए मिलते हैं। ठेकेदार की कार्रवाई के डर से अपनी पहचान गुप्त रखने वाली महिला कहती है, ‘‘हम सुबह 10 बजे आते हैं और रात 9 बजे के बाद ही जाते हैं और महीने में केवल 2 दिन की छुट्टी मिलती है। हमें जो वेतन मिलता है वह बहुत कम है और कहीं और काम करने का समय भी नहीं है।’’ 

हर कैंटीन के बाहर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दिल्ली की मुख्यमंत्री गुप्ता और वाजपेयी की तस्वीरें लगी हैं। कैंटीन का नाम वाजपेयी के नाम पर रखा गया है, लेकिन उनकी तस्वीर तीनों में सबसे छोटी है। कैंटीनों के अंदर भी इसी तरह के पोस्टर लगे हैं।  
आंध्र प्रदेश के 48 वर्षीय अप्पू राव  ने कहा, ‘‘मोदी अब (रियायती) भोजन दे रहे हैं लेकिन दक्षिण में तो यह बहुत पहले से दिया जा रहा है। दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है। यह पहले यहीं होना चाहिए था। गैस सिलैंडर की कीमत अब 4,000 रुपए हो गई है। वह (मोदी) असल में हमसे छीन रहे हैं। सब कुछ महंगा हो गया है।’’ दिहाड़ी मजदूर राव का कहना है कि वह कैंटीन में नियमित रूप से नहीं आते, क्योंकि उन्हें खाना पसंद नहीं है। ‘‘सबमें आलू डाल देते हैं। लेकिन जब काम नहीं मिलता, तो मैं यहां आ जाता हूं।’’ वह कहते हैं कि दाल ठीक है। 

दिल्ली के अलावा, अन्य राज्यों में भी सार्वजनिक कैंटीनों में रियायती भोजन उपलब्ध है। आई.आई.टी. दिल्ली की प्रोफैसर रीतिका खेरा का कहना है कि भारत के लगभग एक दर्जन प्रमुख राज्य ऐसा करते हैं, जिनमें तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश शामिल हैं। उनका कहना है कि 1990 के दशक के मध्य में महाराष्ट्र में शुरू किए गए झुन्का भाकर केंद्र संभवत: इस तरह की पहली सार्वजनिक कैंटीन पहल है। अटल कैंटीन कई जगहों पर काफी लोकप्रिय हैं, जिनमें से एक दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर स्थित आनंद विहार है, जो अंतरराज्यीय बस टर्मिनल और रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूरी पर है। यहां लोगों का आना-जाना लगा रहता है, जिनमें से कई लोग बड़े-बड़े यात्रा बैग लिए होते हैं। 

‘भरपेट खाना सिर्फ 5 रुपये में।’ यह नारा कैंटीनों में बार-बार सुनाई देता है। 17 वर्षीय खुशबू कुमारी, जो अपने माता-पिता और तीन भाई-बहनों के साथ यात्रा कर रही हैं, के लिए यह कैंटीन एक विश्राम स्थल है, क्योंकि वे उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ स्थित अपने गांव पहुंचने के लिए बसें बदल रही हैं। वह कहती हैं कि खाना उनके स्कूल में मिलने वाले दोपहर के भोजन से बेहतर है, हालांकि रोटी कच्ची थी।(साभार ‘हिंदू)-निखिल एम. बाबू

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