होम्योपैथ बने एलोपैथ…!

मैंने यह पढ़ कर सिहरन महसूस की कि महाराष्ट्र सरकार उन होम्योपैथ्स को, जो आधुनिक फार्माकोलॉजी (औषध विज्ञान) में 1 साल का कोर्स पूरा करते हैं, कुछ एलोपैथिक दवाएं लिखने की अनुमति दे रही है। कितना असाधारण शॉर्टकट है! शायद कल, सप्ताहांत की एक वर्कशॉप में भाग लेने के बाद, मुझे विमान उड़ाने की अनुमति मिल जाएगी। मैंने अक्सर यात्रा की है, पायलटों को कॉकपिट में प्रवेश करते देखा है और यहां तक कि मुझे यह भी पता है कि विमानों को उतरने से पहले उड़ान भरनी चाहिए। निश्चित रूप से, यह मुझे योग्य बनाने के लिए पर्याप्त होना चाहिए, है न? या शायद मेरी पत्नी, जो एक एलोपैथिक डॉक्टर हैं, 6 महीने तक गुणा सीखने के बाद चार्टर्ड अकाऊंटैंट बन सकती हैं। वह पहले से ही जानती हैं कि मरीज की नब्ज कैसे मापी जाती है, इसलिए बैलेंस शीट बनाना बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए!
लेकिन चिकित्सा कोई मजाक नहीं है।
मैंने अपनी पत्नी को डॉक्टर बनने के लिए वर्षों तक पढ़ाई करते देखा है। आज भी, वह खुद को अपडेट रखने के लिए निरंतर चिकित्सा शिक्षा कार्यक्रमों और सैमीनारों में भाग लेती हैं। चिकित्सा ज्ञान केवल विश्वविद्यालय की कक्षाओं तक सीमित नहीं रहता। नई बीमारियां सामने आती हैं। नई दवाएं विकसित की जाती हैं। पुराने उपचारों को खारिज कर दिया जाता है। खुराक (डोका) बदलती हैं। दुष्प्रभाव सामने आते हैं। दवाओं के आपस में परस्पर प्रभाव से मरीज की जान बच भी सकती है और जा भी सकती है। फिर भी, हम यह कल्पना करते हैं कि एक छोटा-सा ब्रिज कोर्स किसी तरह एक महासागर को पाट सकता है। यह होम्योपैथ्स पर हमला नहीं है। उन्होंने चिकित्सा की अपनी पद्धति का अध्ययन किया है और उन्हें इसे जिम्मेदारी से अपनाना चाहिए। लेकिन होम्योपैथी और एलोपैथी अलग-अलग विषय हैं। यदि वे समान होते, तो उन्हें अलग-अलग नाम देने, अलग-अलग कॉलेज स्थापित करने, अलग-अलग पाठ्यक्रम निर्धारित करने और अलग-अलग डिग्री देने की कोई आवश्यकता नहीं होती। तर्क यह है कि ये नए योग्य चिकित्सक उन गांवों, झुग्गियों और छोटे शहरों में सेवा दे सकते हैं, जहां पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं।
आह, कितना शानदार विचार है! शहरों में पूरी तरह से प्रशिक्षित डॉक्टर हों, जबकि गरीबों को कम योग्यता वाले डॉक्टर मिलें। ग्रामीण शायद दीवार पर टंगे प्रमाण पत्र की जांच न करें। झुग्गी-बस्ती में रहने वाला व्यक्ति शायद केवल यह पूछे कि परामर्श का शुल्क कितना है। लेकिन शिक्षा की कमी से किसी व्यक्ति का जीवन कम मूल्यवान नहीं हो जाता। एक गरीब मरीज का हृदय, लिवर, फेफड़े और गुर्दे बिल्कुल वैसे ही होते हैं, जैसे कि किसी मंत्री, उद्योगपति या नौकरशाह के। यदि ग्रामीण भारत में डॉक्टरों की कमी है, तो अधिक डॉक्टरों को प्रशिक्षित करें और ऐसी स्थितियां बनाएं जो उन्हें वहां सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करें। हर मैडीकल कॉलेज से कहें कि वे अपने स्नातकों के लिए कम सेवा वाले क्षेत्रों में 2 साल बिताना अनिवार्य करें। उचित वेतन, आवास, उपकरण, सुरक्षा और आगे के अध्ययन के अवसर प्रदान करें। सी.एम.सी. वेल्लोर जैसे संस्थानों ने लंबे समय से सेवा प्रतिबद्धताओं का मूल्य प्रदर्शित किया है।
मानकों को कम करके कमी को हल न करें। गलत तरीके से लिखी गई दवा यह नहीं पूछती कि मरीज अमीर है या गरीब और फिर नुकसान पहुंचाती है। हर नुस्खे के साथ जिम्मेदारी जुड़ी होती है। हर निदान के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। हर मरीज योग्यता का हकदार है। क्योंकि हर जीवन, चाहे वह मुंबई की किसी इमारत में हो या गांव की किसी झोंपड़ी में, अनमोल है…!-दूर की कौड़ी राबर्ट क्लीमैंट्स




