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होर्मुज का दबाव, संसद का टकराव, अंतरराष्ट्रीय तनाव के बीच देश का हाल | मुद्दे बदलते, सवाल वही

गरज बरस कर, ईरान को नुकसान पहुंचा कर अमेरिका निकल गया, लेकिन ‘होर्मुज’ की नाकेबंदी छोड़ गया। तब सारी दुनिया करे पुकार- होर्मुज खोलो, होर्मुज खोलो मेरे सरकार। इस गुहार को देख ईरान अकड़ता दिखा कि मैं तो तेल की हर बूंद पर शुल्क वसूलूंगा, जो देगा, वह तेल लेगा। दुनिया महसूस करे कि ये तो ‘भयादोहन’ है। इस दबाव में ‘नाटो’ टूटा, अमेरिका से उसका साथ छूटा, अंकल सैम गरियाए कि ‘नाटो’ का एक भी देश उनके साथ न आया।

फिर एक दिन अंकल सैम बने ‘ईसा मसीह’ करने दुनिया की ‘चंगाई’ और एक दिन पोप को ही खरी-खरी सुनाई। एक एंकर ने पूछा कि क्या बला है ये अंकल सैम? और खुद जवाब दिया: वे पटरी से उतरे हैं, उनकी जगह जेल है, वे ‘विध्वंसक’ हैं, पर अपने को ‘मसीहा’ समझतें है, लेकिन ‘मसीहा’ जैसा आचरण नहीं है। कहते हैं मैंने पोप को ‘बनाया’ अब पोप मुझे ‘बना’ रहे हैं।

एक चर्चक ने बताया कि नेतन्याहू का कहना है कि यह लड़ाई ‘चिल्ड्रेन आफ लाइट’ और ‘चिल्ड्रेन आफ डार्कनेस’ के बीच है, यह ‘छद्म युद्ध’ है। एंकर ने पूछा, किस ईश्वर ने 116 बच्चों की हत्या करने को कहा? एक विशेषज्ञ बोले, यह युद्ध ‘क्रूसेड’ बरक्स ‘जिहाद’ है…यह युद्ध ‘इस्लाम’ को जिताएगा, ऐसा कहना सही नहीं, अमेरिकी नेता ‘राजनीतिक इस्लाम’ को समझते ही नहीं। एक एंकर ने कहा, अमेरिका में कैथोलिक 46 फीसद हैं, अंकल सैम धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस पर अमेरिकी मामलों के विशेषज्ञ बोले, गनीमत है कि अमेरिका के लोग अंकल सैम को गंभीरता से नहीं लेते। फिर खबर आई कि दुनिया में होती धुनाई देख अंकल सैम ने खुद को ‘ईसा मसीह’ दिखाने वाले पोस्टर हटाए।

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एक दिन बिहार से खबर आई कि अगले मुख्यमंत्री भाजपा के सम्राट चौधरी बनेंगे, साथ में जद (एकी) के दो उपमुख्यमंत्री बनेंगे…और आश्चर्य कि सब बिना किसी विघ्न के निपट गया। फिर एक दिन 92 बरस की महान गायिका आशा भोसले का निधन हो जाता है और चैनल आशा जी को श्रद्धांजलि देने लग जाते हैं, उनका बचपन, उनकी गायकी, उनका संघर्ष, बहन लता के मुकाबले अपनी जगह बनाना और अनेक भाषाओं में 12 हजार से अधिक गानों का कीर्तिमान बनाना, उनकी यादें सब चैनलों पर दिखाई जाती रहीं।

फिर एक दिन ‘नासिक’ आधारित ‘कार्पोरेट जिहाद’ की नई कहानी ने दर्शक एवं श्रोताओं को चौंका दिया कि महिला कर्मियों को आठ लोगों द्वारा धर्मांतरण के लिए प्रेरित और मजबूर किया जाता था। एक पीड़िता ने बताया कि उसे किस तरह से धमकाया जाता था और पुलिस शिकायत तक नहीं सुनती थी। बहसों में विपक्ष के प्रवक्ता इस ‘कार्पोरेट जिहाद’ को नरम करते दिखते कि ये व्यवस्था की नाकामी है, पुलिस ने कई आरोपितों को गिरफ्तार किया।

मगर सबसे बड़ी खबर बनाई महिला आरक्षण से संबंधित विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के विशेष सत्र के आह्वान ने। साथ ही संसद के ‘सीट परिसीमन’- ‘समानुपातिक तरीके से सीट संख्या बढ़ाने के ‘प्रस्ताव’ ने! इस प्रस्ताव की खबर आते ही विरोध शुरू। इधर संसद सत्र का आगाज, उधर तमिलनाडु में संबंधित विधेयक की प्रति को सार्वजनिक रूप से जलाना और कहना कि ये दक्षिण के प्रति अन्याय है। द्रमुक प्रवक्ता कहते रहे कि दक्षिण की आबादी कम, उत्तर की ज्यादा… अगर जनसंख्या के आधार पर सीट संख्या तय होगी, तो दक्षिण के साथ अन्याय होगा, साथ ही विपक्ष के कुछ बडे नेता भी कूद पड़े कि इससे ‘उत्तर-दक्षिण’ का ‘भेद’ बढ़ेगा…।

बहसों में सत्ता प्रवक्ता बार-बार स्पष्ट करते रहे कि ‘परिसीमन’ में हर राज्य की कुल सीटों में पचास फीसद बढ़ोतरी होगी और इस फार्मूले से किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। जनसंख्या के हिसाब से बढ़ाएंगे, तो दक्षिण को नुकसान होगा, लेकिन इस फार्मूले से किसी को नुकसान नहीं होगा। संसद में प्रधानमंत्री ने किसी के भी साथ अन्याय न होने की गारंटी दी, फिर भी विपक्ष अड़ा रहा। जब जनसंख्या की बात निपट गई, तो कुछ कहें कि इतनी देर से क्यों लाए, तो कुछ कहें कि इतनी जल्दी क्या है? कुछ कहें कि कोटा में कोटा दो, तो कुछ कहें 543 में ही पचास फीसद अभी बढ़ा दीजिए। फिर एक विपक्षी नेता ने मुसलिमों के लिए आरक्षण की बात की, जिसका जवाब गृहमंत्री ने दिया कि संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था नहीं है।

प्रधानमंत्री ने संसद में विपक्ष को आश्वस्त करने की कोशिश की और कहा, ‘किसी के प्रति भेदभाव नहीं होगा… इसकी वे गारंटी देते हैं, महिला आरक्षण नारी शक्ति का हक है। कुछ सोचते हैं कि इसमें राजनीतिक स्वार्थ है। बात ‘मैं’ ‘तुम’ की नहीं ‘हम’ की है। हम इसे राजनीतिक तराजू पर न तोलें, एक राष्ट्र के रूप में विचार करें, टुकड़ों में निर्णय नहीं कर सकते। यह सर्वसम्मति से आगे बढ़े… यह भारत की सांस्कृतिक प्रतिबद्धता है। विकास को गति देने के लिए महिलाओं की भूमिका जरूरी है… सदन में उनकी आवाज शक्ति बनेगी।’ मगर विपक्ष अपनी बात पर अड़ा रहा।

यह भी पढ़ें: आरक्षण, परिसीमन और सियासी दांव: क्या था असली एजेंडा | बहस के पीछे की कहानी

सरकार और भाजपा ने संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर एक विमर्श गढ़ने की कोशिश की। यह विमर्श पूरी तरह से गलत था: यह विकृत तथ्यों और कानून की संदिग्ध व्याख्या पर आधारित था। 16 अप्रैल, 2026 को यह कानून बिल्कुल स्पष्ट था। संविधान (106वां) संशोधन सितंबर, 2023 में पारित हो चुका था और यह देश के संविधान का हिस्सा था। इसने संविधान में अनुच्छेद 334ए को जोड़ा, लेकिन केवल सरकार ही जानती है कि किन कारणों से इस संशोधन को अधिसूचित नहीं किया गया था। (इसे 16 अप्रैल की रात को अधिसूचित किया गया)। संशोधन में लोकसभा की वर्तमान संख्या (543 सदस्य) में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया था। महिलाओं के लिए आरक्षण एक स्थापित तथ्य था। अनुच्छेद 334ए पर पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

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