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सुरक्षा और विकास की नई मजबूती जरूरी

हमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की रक्षा इकाइयों को तकनीकी शैक्षणिक संस्थानों के साथ जोडक़र सैन्य साजो-सामान को अत्याधुनिक बनाने की दिशा में तेजी से बढऩा होगा…

हाल ही में 14 अगस्त को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सिंधु जल संधि पर भारत को ‘रेड लाइन’ और जंग की धमकी दी है। ऐसी धमकियां देना पाकिस्तान के नेताओं के जीवन का अभिन्न भाग बन गई है। पाकिस्तान में यह भी माना जा रहा है कि गत 7 अगस्त को सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षरित मक्का संयुक्त रक्षा समझौता भारत पर रक्षा दबाव बढ़ाएगा। इस समझौते के तहत किसी एक देश पर हमला तीनों देशों पर हमला माना जाएगा। इस गठजोड़ में सुरक्षा सहयोग के बढ़ते आयाम भारत के लिए एक नई भू-राजनीतिक चुनौती उत्पन्न करते हैं, जिससे भविष्य की सुरक्षा स्थितियों में कूटनीतिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं। ऐसे में भारत के लिए आर्थिक और सैन्य-परमाणु शक्ति दोनों मोर्चों पर समान रूप से और मजबूत होना जरूरी है। आर्थिक मजबूती से ही मजबूत सैन्य-परमाणु शक्ति बनने की राह आगे बढ़ती है और ऐसी मजबूती युद्ध के खतरे भी कम करती है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि भारत आर्थिक विकास के साथ सैन्य व परमाणु हथियार मोर्चे पर भी लगातार आगे बढ़ रहा है। यदि हम भारत के विकास परिदृश्य को देखें तो पाते हैं कि वैश्विक भू-राजनीतिक चुनौतियों और पश्चिम एशिया संकट के बीच भी भारत की विकास दर 7 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है।

दुनिया में भारत के प्रति आर्थिक विश्वास बढ़ रहा है, विदेशी निवेश बढ़ रहे हैं, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 692 अरब डॉलर से अधिक की ऊंचाई पर पहुंच गया है, भारत के मुक्त व्यापार समझौते बढ़ रहे हैं और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढऩे वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। दूसरी ओर सैन्य और परमाणु शक्ति की राह पर भी भारत आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। हथियारों पर नजर रखने वाली वैश्विक संस्था ‘स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत अपने परमाणु निवारक तंत्र को लगातार आधुनिक बना रहा है। हालिया आंकड़ों के मुताबिक भारत के पास परमाणु वॉरहेड्स की संख्या लगभग 190 तक पहुंच गई है। भारत की नीति में अब यह बदलाव भी देखा जा रहा है कि वह शांति काल में भी अपने कुछ परमाणु वॉरहेड्स को डिलीवरी सिस्टम (जैसे कैनिस्टराइज्ड मिसाइलें और परमाणु पनडुब्बियां) के साथ उपयोग के लिए तैयार रखने की दिशा में बढ़ा है। मिसाइलों को कैनिस्टर में रखने और समुद्र में ‘डिटरेंस गश्त’ करने जैसे कदमों से संकेत मिलता है कि भारत अपनी त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत कर रहा है। चीन और पाकिस्तान की दोहरी चुनौती को देखते हुए भारत की रक्षा तैयारी रणनीति के तहत यह एक महत्वपूर्ण एवं रणनीतिक बदलाव है। निश्चित रूप से एक ऐसे समय में जब भारत की सीमाएं बढ़ती भू-राजनीतिक चुनौतियों के मद्देनजर अधिक संवेदनशील हो गई हैं, तब भारत को न केवल दुनिया की आर्थिक शक्ति, वरन उन्नत तकनीक और परमाणु सामथ्र्य से सुसज्जित सैन्य शक्ति बनने की ओर अधिक आवश्यकता है। भारत के पड़ोस में पाकिस्तान द्वारा चीन निर्मित आधुनिक हथियारों और तकनीक की मदद से छद्म युद्ध व घुसपैठ को प्रश्रय दिया जाता रहा है। चीन की ओर से भी वास्तविक नियंत्रण रेखा एवं विशेष रूप से काराकोरम दर्रे के पास चुनौतियां पैदा की जा रही हैं। चीन द्वारा सीमावर्ती क्षेत्रों में सैन्य बुनियादी ढांचे का निर्माण और हिंद महासागर में ‘स्ट्रिंग ऑफ पल्र्स’ नीति के जरिए पैठ बढ़ाने का प्रयास जारी है।

ऐसे में भारत, चीन के हर विस्तारवादी कदम का लगातार कड़ा और बहुआयामी जवाब दे रहा है। अतीत में भी जब भारत ने आतंकी ठिकानों के खिलाफ कठोर सैन्य कार्रवाई की है, तब चीन और उसके सहयोगी देशों का रणनीतिक तालमेल देखने को मिला है। अब पाकिस्तान द्वारा चीन के सहयोग से अपनी मिसाइल क्षमता और पारंपरिक हथियारों का विस्तार किया जा रहा है। अमरीकी इंटेलिजेंस की ‘एनुअल थ्रेट असेसमेंट’ रिपोर्ट में भी यह रेखांकित किया गया है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार भारत सहित दक्षिण एशिया में खतरा पैदा करने वाले हैं। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि भारत किसी भी परमाणु खतरे या दोतरफा सामरिक चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार है। देश की रक्षा नीति स्पष्ट है कि भारत पहले परमाणु हथियार का उपयोग नहीं करेगा, लेकिन यदि शत्रु ने दुस्साहस किया तो उसका करारा और निर्णायक जवाब दिया जाएगा। भारत का न्यूनतम विश्वसनीय प्रतिरोध और मजबूत कमान-नियंत्रण प्रणाली किसी भी आक्रमण को विफल करने के लिए सतर्क है। आधुनिक लंबी दूरी की मिसाइलें देश की संप्रभुता और सुरक्षा को पुख्ता करती हैं। भारतीय सशस्त्र बल दोनों पड़ोसियों की ओर से मिलने वाली हर पारंपरिक व सामरिक चुनौती का माकूल जवाब देने के लिए पूरी तरह तत्पर हैं। भारतीय सेना हर परिस्थिति का सामना करने और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निरंतर अपनी रणनीतिक क्षमताओं को सशक्त बना रही है। नि:संदेह, बीते वर्षों में आर्थिक और रक्षा विकास की नई रणनीति के तहत देश को आर्थिक और सामरिक आधारों पर मजबूती मिली है। भारत ने आतंकवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की कठोर नीति अपनाई है। सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयरस्ट्राइक के दौरान पूरी दुनिया ने देखा कि भारतीय सेना ने आधुनिक और स्वदेशी हथियारों के बल पर दुश्मन को कड़ा सबक सिखाया। आज भारत रक्षा क्षेत्र में एआई, ड्रोन तकनीक और आधुनिक निगरानी प्रणालियों का प्रभावी इस्तेमाल कर रहा है। हाल ही के वर्षों में भारत ने रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है और इसका रक्षा निर्यात 38000 करोड़ रुपए से अधिक के स्तर को पार कर गया है। इन उपलब्धियों के बावजूद भारत को यह दृढ़ता से स्वीकार करना होगा कि प्रतिस्पर्धी पड़ोसियों से टकराव की आशंका बनी रह सकती है। साथ ही हालिया वैश्विक व क्षेत्रीय संघर्षों से भारत के लिए तेज विकास के साथ रक्षा मोर्चे पर आत्मनिर्भर बनने का सबक स्पष्ट रूप से उभरता है। ऐसे में भारत के लिए तेज आर्थिक विकास के साथ-साथ युद्ध के लिए अर्थव्यवस्था को तैयार करने, मजबूत सैन्य शक्ति व उन्नत परमाणु शक्ति संपन्न देश बनने के लिए और अधिक रणनीतिक कदमों के साथ आगे बढऩा जरूरी है। 2047 तक विकसित भारत बनाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उस राह पर तेजी से आगे बढऩे के लिए देश का तेज आर्थिक विकास अनिवार्य है।

नीति आयोग के अनुसार, 2047 तक विकसित भारत के लिए देश की अर्थव्यवस्था को 30-35 ट्रिलियन डॉलर और प्रति व्यक्ति आय को 18000 डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। इसके लिए भारत को लगातार उच्च विकास दर बनाए रखनी होगी। आगामी वर्षों में देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए जेन-जी की ऊर्जा को आर्थिक विकास से जोडऩा होगा। साथ ही, अर्थव्यवस्था को रक्षा क्षेत्र में पूर्णत: आत्मनिर्भर बनाना होगा, जिसका उद्देश्य विदेशी निर्भरता को खत्म करना, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना और रक्षा निर्यात को बढ़ाना है। हमें सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की रक्षा इकाइयों को तकनीकी शैक्षणिक संस्थानों के साथ जोडक़र सैन्य साजो-सामान को अत्याधुनिक बनाने की दिशा में तेजी से बढऩा होगा। आज के समय में युद्ध केवल सीमाओं पर ही नहीं लड़े जाते, बल्कि ये आधुनिक चिप्स, मिसाइलों, स्वार्म ड्रोन, हाइपरसोनिक हथियारों, इलेक्ट्रॉनिक्स और साइबर स्पेस में लड़े जाते हैं। अतएव ‘मेक इन इंडिया’ के तहत आधुनिक हथियारों का स्वदेशीकरण करते हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर युद्ध क्षमताओं को मजबूत करना होगा। उम्मीद करें कि सरकार के साथ देश के वैज्ञानिक, तकनीकी विशेषज्ञ, उद्यमी-कारोबारी और अन्य विभिन्न क्षेत्रों के सभी लोग एकजुटता, परिश्रम व समर्पण से देश को आगे ले जाएंगे।-डा. जयंती लाल भंडारी

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