राजनीति

जेन-कौड और विरोध प्रदर्शन की राजनीति : विपक्ष कहां पहुंचा?

हजारों युवा भारतीयों को अपने हक के लिए न्याय मांगते हुए सड़कों पर उतरते देखने में एक गहरा भावनात्मक पहलू है। जेन-कौड के लिए कोई परीक्षा केवल एक परीक्षा भर नहीं होती। यह वर्षों की तैयारी, माता-पिता के त्याग, वित्तीय निवेश और एक बेहतर जीवन बनाने के सपने का प्रतीक होती है। यही कारण है कि नीट पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली को लेकर उपजे आक्रोश को केवल राजनीतिक आंदोलन बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। जब वह विश्वास डगमगाता है, तो युवाओं को विरोध करने का पूरा अधिकार है। जंतर-मंतर उस आक्रोश को व्यक्त करने का स्वाभाविक स्थान बन गया। लेकिन इसी बीच एक और प्रश्न सामने आया-क्या विपक्ष ने विरोध प्रदर्शन में शामिल होकर इसके स्वरूप को बदल दिया? जवाब और जवाबदेही की मांग को लेकर युवाओं द्वारा शुरू किया गया यह जेन-कौड विरोध प्रदर्शन अनिवार्य रूप से तब और अधिक राजनीतिक हो गया, जब विपक्षी नेता और राजनीतिक कार्यकत्र्ता आंदोलन में शामिल हुए। 

उनकी उपस्थिति ने प्रदर्शनकारियों को अधिक दृश्यता और राजनीतिक प्रभाव भले ही दिया हो लेकिन इसने एक असहज प्रश्न भी खड़ा कर दिया-क्या युवा प्रदर्शनकारी स्वयं यही चाहते थे? या वे केवल यह चाहते थे कि सरकार उनकी बात सुने? यह अंतर महत्वपूर्ण है। एक बार जब राजनीतिक नेता ऐसे विरोध प्रदर्शन में शामिल हो जाते हैं, तो संदेश बदल सकता है। टैलीविजन कैमरे अब केवल छात्रों पर केंद्रित नहीं रहते। राजनीतिक भाषण हावी होने लगते हैं। नारे अधिक तीखे हो जाते हैं। सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ जाती है। विपक्ष को एक अवसर दिखाई देता है। मूल मुद्दा व्यापक राजनीतिक लड़ाई में दबने के जोखिम में पड़ जाता है। और यहीं पर विपक्ष को स्वयं से एक अत्यंत गंभीर प्रश्न पूछने की आवश्यकता है-क्या सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के मामले में उसने अपनी जिम्मेदारी की भावना खो दी है? विपक्षी दलों को विरोध करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। लेकिन प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ेहोने और उनके विरोध प्रदर्शन पर कब्जा करने में अंतर होता है। शांतिपूर्ण मार्च आयोजित करने और सुरक्षा बलों के साथ जानबूझकर टकराव की स्थिति पैदा करने में भी अंतर होता है। एक जिम्मेदार विपक्ष को पता होना चाहिए कि वह सीमा रेखा कहां है। 

यहीं पर राजनीतिक नेतृत्व महत्वपूर्ण हो जाता है। एक विपक्षी नेता का काम केवल विरोध को अधिक मुखर बनाना नहीं है। इसका काम इसे अधिक जिम्मेदार बनाना है। यदि छात्र पहले से ही भावुक, आक्रोशित और हताश हैं, तो राजनेताओं को उन्हें भड़काने की बजाय शांत करना चाहिए। यदि युवा प्रदर्शनकारी किसी प्रतिबंधित क्षेत्र की ओर बढ़ रहे हैं, तो जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व को उनसे कहना चाहिए-हमने अपनी बात रख दी है। हमें सुन लिया गया है। आइए हम सीमा न लांघें। इसके विपरीत, यदि राजनेता यह जानते हुए भी प्रदर्शनकारियों को आगे बढऩे के लिए प्रोत्साहित करते हैं कि पुलिस को हस्तक्षेप करना ही पड़ेगा, तो परिणामी टकराव लगभग अपरिहार्य हो जाता है।और तब पूरे विरोध प्रदर्शन का स्वरूप ही बदल जाता है। जो आंदोलन परीक्षा सुधार के लिए शुरू हुआ था, वह सरकार और विपक्ष के बीच का टकराव बन जाता है। छात्र पृष्ठभूमि बन जाते हैं। राजनेता सुर्खियां बन जाते हैं। जेन-कौड निश्चित रूप से यह नहीं चाहता होगा। जेन-कौड एक ऐसी पीढ़ी है जो अलग तरह से संवाद करती है। यह पारंपरिक राजनीतिक ढांचों के प्रति कम धैर्य रखती है। यह राजनीतिक दलों को लेकर अधिक संशयवादी है। 

यही कारण है कि राजनीतिक दलों को सतर्क रहना चाहिए। वे सोच सकते हैं कि किसी युवा आंदोलन में शामिल होकर वे युवाओं की मदद कर रहे हैं। लेकिन युवा इसे अलग दृष्टिकोण से देख सकते हैं। वे पूछ सकते हैं-‘आप हमारे मुद्दे को अपना राजनीतिक हथियार क्यों बना रहे है?’ यह भारतीय राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है क्योंकि जेन-कौड संभवत: किसी के राजनीतिक खेमे से जुडऩा नहीं चाहता। उसे परिणाम चाहिए। वह चाहता है कि राजनेता सवालों के जवाब दें। और शायद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह चाहता है कि उसे गंभीरता से लिया जाए। राजनीतिक दलों से स्वतंत्र एक शांतिपूर्ण युवा आंदोलन में अपार शक्ति होती है। जिस क्षण यह राजनेताओं द्वारा नियंत्रित दिखने लगता है, सरकार इसे विपक्ष-प्रायोजित आंदोलन बताकर खारिज कर सकती है। यह उन छात्रों के साथ घोर अन्याय होगा, जिन्होंने इसे शुरू किया था। यह एक और खतरे को भी जन्म देता है। यदि हर बड़ा विरोध प्रदर्शन विपक्षी नेताओं के शामिल होने, भड़काऊ भाषण दिए जाने और प्रदर्शनकारियों द्वारा भारी सुरक्षा वाले सरकारी भवनों की ओर बढऩे के साथ समाप्त होता है, तो जनता धीरे-धीरे टकराव की आदी हो सकती है। तब विरोध प्रदर्शन तमाशा बन जाता है। 

संभवत: सबसे शक्तिशाली संदेश जो युवा प्रदर्शनकारी प्रत्येक राजनीतिक दल को दे सकते हैं, वह यह है: ‘हमारे साथ खड़े हों लेकिन हमारे ऊपर से न बोलें।’ यह एक नए प्रकार की राजनीति होगी। ऐसी राजनीति, जहां युवा नागरिकों को अपनी आवाज सुनाने के लिए किसी पार्टी के झंडे की आवश्यकता न पड़े। ऐसी राजनीति, जहां विपक्ष को हर शिकायत को टकराव में बदलने की आवश्यकता न हो। ऐसी राजनीति, जहां सरकार हर विरोध प्रदर्शन को शत्रुतापूर्ण कार्रवाई न समझे और ऐसी राजनीति, जहां शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन एक लोकतांत्रिक अधिकार बना रहे, बजाय इसके कि वह यह देखने की होड़ बन जाए कि कौन सबसे बड़ा तमाशा खड़ा कर सकता है।-देवी चेरियन

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