तकनीकी

जीवन से कीमती नहीं है मोबाइल

घर-परिवार में अभिभावकों व स्कूल में शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें…

जरा सोचिए मोबाइल प्यारा है या जिंदगी? मलेरिया, डायरिया, पायरिया या डिफ्थीरिया या किसी और रोग की वजह से किसी की मृत्यु हो जाए तो बात समझ आती है, लेकिन यदि मोबाइल के लिए मोबाइलेरिया से कोई मौत को गले लगा ले तो क्या किया जा सकता है? धर्मशाला क्षेत्र के एक चौदह वर्षीय बच्चे ने इस आक्रोश में जान दे दी क्योंकि उसके अभिभावकों ने बच्चे के काफी देर मोबाइल पर गेम खेलने के पश्चात मोबाइल को अपने पास रख लिया। मोबाइल के नशे में चूर अबोध बच्चे ने नाराजगी जताते हुए चुपचाप अपने कमरे में दुप्पट्टे से फांसी लगा ली। अपने अमूल्य जीवन की कोई कीमत न समझते हुए चौदह वर्षीय बच्चे का यह कदम बहुत ही दु:खद और पीड़ादायक है। 26 जुलाई 2026 को गगल थाना क्षेत्र में मोबाइल पाने के झगड़े में एक बारह वर्षीय बच्ची जहर खाकर आत्महत्या कर लेती है। रानीताल क्षेत्र में मोबाइल न मिलने पर एक अबोध बच्चा घर छोड़ कर चला जाता है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद में आईफोन खरीदने जिद में पहाड़ी पर खड़े होकर बेटे को छलांग लगाते रोकने के असफल प्रयास में बाप और बेटे की मौत और बाद में मां के छलांग लगाने से एक ही परिवार के तीन सदस्य पल भर में प्राण खो बैठते हैं। मोबाइल के कारण आत्महत्या जैसे बहुत से मामले पुलिस के अभिलेखों में पंजीकृत हो रहे हैं। इस तरह की अनगिनत घटनाएं प्रतिदिन हमारे सामने आ रही हैं। इससे यह पता चलता है कि संचार और तकनीक की दुनिया ने हमें कितना मजबूर कर दिया है कि हम अपने अमूल्य जीवन की कीमत भी नहीं समझ पा रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में न्यायालय द्वारा पत्नी द्वारा हर पल सोशल मीडिया पर व्यस्त रहने तथा पारिवारिक कर्तव्य न निभाने के लिए पीडि़त पति को तलाक दिलवाया जाता है। संचार क्रांति के युग में यह तो ठीक है कि मोबाइल हरेक व्यक्ति की जरूरत है, लेकिन इतनी भी नहीं कि मोबाइल के लिए जीवन की कुर्बानी देनी पड़े। बच्चे और अभिभावक कितने मजबूर हो चुके हैं कि बच्चा मोबाइल के बिना रह नहीं सकता और अभिभावक उसे रोक नहीं सकते। डाक्टरों, शोधकर्ताओं और मनोविज्ञानियों का कहना है कि मोबाइल से न केवल व्यक्ति पर शारीरिक, सामाजिक असर पड़ रहा है बल्कि मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी इसके दुष्प्रभाव का शिकार हुआ है। सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक से करोड़ों-अरबों कमाने वाले बड़े-बड़े कारोबारी भी अपने बच्चों को चौदह वर्ष तक मोबाइल से दूर रखते हैं। मेटा, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल और स्नैप से जुड़े दिग्गज मालिक और अधिकारी बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने के पक्ष में हैं। इस मोबाइल ने व्यक्ति की आंखों तथा स्मरण शक्ति को भी प्रभावित किया है। अस्पतालों में मनोवैज्ञानिकों तथा चिकित्सकों के पास काउंसलिंग, परामर्श तथा निदान के बहुत से मामले आने शुरू हो गए हैं। यह हम सब जानते हैं कि मोबाइल के कारण व्यक्ति अपने तक ही सीमित हो गया है जिससे व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक दूरियां भी बढ़ी हैं। घर में बैठे पति-पत्नी, बच्चों को अपने अपने मोबाइल पर व्यस्त हुए आमतौर पर देखा जा सकता है। मोबाइल के अत्यधिक प्रयोग से लोगों की आंखों में जलन, धुंधलापन, सिरदर्द, चक्कर आना, नींद न आना, गर्दन, कन्धे, पीठ में दर्द, मोटापा जैसी शारीरिक समस्याएं आम हो गई हैं।

आदमी की स्मरण शक्ति क्षीण हो रही है। बच्चों का पढ़ाई में मन न लगना, एकाग्रता की कमी, थकान, नहाना नहीं, भूख नहीं, चिंता, घबराहट, बेचैनी, चिड़चिड़ापन, आक्रोश, आक्रामकता, किसी भी काम में मन न लगना, काम में टालमटोल करना, रील या सोशल मीडिया में व्यस्त रहना, बार-बार नोटिफिकेशन चैक करना जैसे लक्षण आम हो गए हैं। बच्चे परिवार के लोगों के साथ कम बातचीत करते हैं। हम परिवार के साथ रहते हुए भी मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं। बच्चों में खेलने-कूदने और अन्य पारिवारिक तथा सामाजिक गतिविधियों में कोई रुचि नहीं है। उनमें रचनात्मकता तथा सृजनात्मकता जैसी गतिविधियों का अभाव पाया जा रहा है। माता-पिता और अभिभावक अपने में व्यस्त हैं। उनके पास बच्चों के लिए समय नहीं है। बच्चों की भावनाओं और संवेदनाओं को नहीं समझा जाता। बच्चे अकेलेपन में जी रहे हैं। निदा फाजली का शे’र याद आ रहा है, ‘जिसे भी देखिए वो अपने आप में गुम है, जुबां मिली है मगर हमजुबां नहीं मिलता।’ बच्चों की सुनने वाला, उनकी किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तन, मानसिक और मनोस्थिति को समझने वाला कोई नहीं। बचपन में अपनी जान छुड़ाने के लिए मां-बाप द्वारा बच्चों को मोबाइल थमा दिया जाता है। मां-बाप और बच्चों के बीच में संवाद नहीं है। माता-पिता के दृष्टिकोण से आवश्यक यह है कि वे बच्चों के संवेगों, भावनाओं, संवेदनाओं, समस्याओं और उनकी मनोदशा को समझें। आमतौर पर बच्चों का जिद करना, आक्रोशित होना तथा आत्महत्या जैसे अंतिम विकल्प पर जाना इसी बात की परिणति है कि जीवन की आपाधापी और जीवन संघर्ष के बीच माता-पिता के पास अपनी संतानों के लिए समय ही नहीं है। उल्टी-सीधी और अश्लील साइट्स देखकर बच्चे अल्पायु में ही बाल्यावस्था से किशोरावस्था और युवावस्था में पहुंच रहे हैं।

यहां पर संचार, तकनीक तथा मोबाइल प्रेमी ये अवश्य कहेंगे कि संचार और विकास क्रान्ति के इस युग में जहां दुनिया की आर्थिकी व सभी काम-धंधे मोबाइल, कम्प्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के माध्यम से होते हैं, वहां पर कैसा संकीर्ण, दकियानूसी और पिछड़ा हुआ ज्ञान बांटा जा रहा है, परन्तु यह भी परम् सत्य है कि जीवन बचेगा तभी सब कुछ संभव है। यदि आत्महत्याओं से सन्तानें ही नहीं बचेंगी या फिर वे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक रूप से स्वस्थ और सक्षम नहीं होंगे तो ऐसे अक्षम और मानसिक रूप से विक्षिप्त बच्चों का क्या करेंगे? आवश्यक यह है कि इन संचार संसाधनों का संतुलित प्रयोग हो। ये सभी संचार उपकरण हमारे जीवन को सुलभ बनाने के लिए हैं, न कि बर्बाद करने के लिए। घर-परिवार में अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें। विशेष रूप से शिक्षण संस्थाओं के मुखिया और शिक्षकों से प्रार्थना है कि वे इस विषय पर बच्चों के साथ बड़ी गम्भीरता से चर्चा करें। देश और दुनिया चलाने के लिए मोबाइल और अन्य संचार उपकरण आवश्यक हैं, अपनी जीवन लीला समाप्त करने के लिए नहीं। इस तरह मोबाइल का सीमित उपयोग सही है।-डा. सुरेश शर्मा

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