‘घोषणा-पत्र’ गायब!

हमारे देश में दो सबसे प्रमुख संवैधानिक संस्थाएं हैं-सर्वोच्च अदालत और चुनाव आयोग। अक्सर शीर्ष अदालत चुनाव आयोग के फैसलों, कार्य-प्रणाली और अभियानों में हस्तक्षेप नहीं करती। दलील दी जाती रही है कि वह भी संवैधानिक संस्था है, लिहाजा संविधान की गरिमा और वैधता को समझती है। अलबत्ता सर्वोच्च अदालत आयोग के फैसलों की आधी-अधूरी समीक्षा जरूर करती रही है। सवाल है कि फॉर्म 6 के साथ जो घोषणा-पत्र नत्थी किया गया था, उसे सर्वोच्च अदालत ने ‘अवैध’ करार क्यों नहीं दिया? आयोग को निर्देश क्यों नहीं दिए गए कि फॉर्म 6 में कोई भी बदलाव उसके अधिकार-क्षेत्र में नहीं है? संसद और भारत सरकार की स्वीकृति और अधिसूचना के बाद ही चुनाव आयोग कोई बदलाव कर सकता था। अब अचानक 26 सितंबर को आयोग का फैसला सामने आया कि जहां ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) हो चुका है अथवा अभी होना है, वहां फॉर्म 6 के साथ घोषणा-पत्र की अनिवार्यता नहीं है। बीती 30 सितंबर को आयोग के ‘साफ्टवेयर तंत्र’ से ही फॉर्म 6 के साथ वाला घोषणा-पत्र गायब हो गया। कहां गया घोषणा-पत्र..? अब किसने फैसला लिया कि घोषणा-पत्र हटा दिया जाए? क्या यह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता और दोनों चुनाव आयुक्तों-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी-का ‘साझा निर्णय’ है? देश को जानने का लोकतांत्रिक और संवैधानिक अधिकार है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के सवाल भी तार्किक लगते हैं कि फॉर्म 6 में अवैध तरीके से बदलाव किसके आदेश से किया गया? ‘टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज’ (टीसीएस) को आदेश किसने दिया? कंपनी में किसने मंजूरी दी? हालांकि नेता प्रतिपक्ष ने घोषणा-पत्र गायब होने का मुद्दा अभी नहीं उठाया है। घोषणा-पत्र को हटाने अथवा गायब होने का महत्व इसलिए है, क्योंकि लाखों वैध मतदाताओं को बाध्य कर घोषणा-पत्र भरवाए जा रहे थे। सॉफ्टवेयर में ऐसी व्यवस्था की गई थी कि यदि मतदाता अपने माता-पिता या दादा-दादी के मतदाता होने की पुष्टि नहीं करता अथवा वह कॉलम नहीं भरता, तो उसे भी मतदाता-सूची में शामिल नहीं किया जाएगा। फॉर्म 6 के घोषणा-पत्र के जरिए मतदाताओं को ‘झूठ’ बोलने को भी विवश किया जाता रहा है कि वह पहली बार मतदाता बनने जा रहे हैं।
इससे पहले उन्होंने कभी भी मतदान नहीं किया। यह मामला भी शीर्ष अदालत के सामने उठना चाहिए। ‘इंडी’ गठबंधन की बैठक में प्रख्यात अधिवक्ता एवं सांसद कपिल सिब्बल ने सुझाव दिया था कि आयोग में आईटी सॉफ्टवेयर सिस्टम की महानिदेशक सीमा खन्ना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करानी चाहिए, क्योंकि सीईसी ज्ञानेश को तो 2023 के कानून के मुताबिक ‘कानूनी कवच’ मिला हुआ है। नतीजतन तय हुआ कि देश भर में सीमा खन्ना के खिलाफ प्राथमिकियां दर्ज कराई जाएंगी। यह भी विपक्ष के ‘राजनीतिक आंदोलन’ का हिस्सा है। बहरहाल फॉर्म 6 के साथ घोषणा-पत्र की बाध्यताएं घोर ‘संवैधानिक क्रूरता’ और अवैधता की व्यवस्था थी। यदि असहमत दोनों चुनाव आयुक्तों के जरिए इस संबंध में सवाल सार्वजनिक नहीं किए जाते, तो तय था कि फॉर्म 6 का ‘फ्रॉड’ भी बेनकाब नहीं होता। बहरहाल चुनाव आयोग ने अब भी स्पष्ट नहीं किया है कि फॉर्म 6 के साथ वाला घोषणा-पत्र हटाने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया? घोषणा-पत्र के कारण जिनका ‘मताधिकार’ छीन लिया गया, क्या वह बहाल किया जाएगा? और कब तक यह संभव होगा? जुलाई और सितंबर के बीच ऐसा क्या हुआ कि घोषणा-पत्र अचानक गायब करना पड़ा? उसे हटाने की प्रशासनिक प्रक्रिया का खुलासा भी नहीं किया गया है। यदि घोषणा-पत्र गायब नहीं किया गया है, तो सॉफ्टवेयर पर दिखाई क्यों नहीं दे रहा है? चुनाव आयोग देश की जनता को न बताए, लेकिन सर्वोच्च अदालत के सामने तो सच बताना ही पड़ेगा। शीर्ष अदालत की भी अग्नि-परीक्षा होनी है, क्योंकि एसआईआर को ‘अवैध’ करार देकर उसे हटाने, खत्म करने की मांग याचिका के जरिए की गई है। दिल्ली में जिन लोगों को नोटिस दिए गए हैं, उनके आधार और पारदर्शिता को चुनौती देते हुए एसआईआर के खिलाफ भी याचिकाएं शीर्ष अदालत के विचाराधीन हैं। बेशक बिहार चुनाव के दौरान शीर्ष अदालत ने एसआईआर को ‘संवैधानिक’ करार दिया था, लेकिन उसके बाद 13.37 करोड़ मतदाताओं के नाम सूचियों से काट दिए गए हैं। कुछ और आयाम भी उभर कर सामने आए हैं, लिहाजा सर्वोच्च अदालत को अब निर्णायक, संवैधानिक व्याख्या वाला फैसला सुनाना ही पड़ेगा। व्यवस्था ऐसी बने कि चुनाव आयोग निष्पक्ष होकर काम कर सके।




