संपादकीय

हलफनामे में सवाल यथावत

सर्वोच्च अदालत में दाखिल चुनाव आयोग के 248 पन्नों के हलफनामे में कई सवाल अनुत्तरित हैं। दो चुनाव आयुक्तों-सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी-ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खोजी खबर में जो 14 आपत्तियां उठाई थीं, उन्हें भी खारिज नहीं किया गया है। उनके आंशिक, अधूरे जवाब ही सामने आए हैं। चुनाव आयोग ने उन खबरों का खंडन आज तक नहीं किया है। बेहद महत्वपूर्ण फॉर्म 6 पर चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण ‘नकली’ लगता है। आयोग का जवाब है कि फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में अलग घोषणा-पत्र जोड़ा गया था। उसे ऑनलाइन फॉर्म के साथ दिखाने से ‘बदलाव का आभास’ हो सकता था। एक ओटीपी, ई-साइन से आवेदन पूरा करने के लिए दोनों को साथ रखा गया था। आयोग ने 21 अक्तूबर को ऑनलाइन आवेदन भी दो हिस्सों में रखने का फैसला किया। आयोग ने स्पष्टीकरण दिया है कि एसआईआर के तीनों आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त तथा दोनों आयुक्तों की सर्वसम्मति से जारी किए गए। सवाल यह है कि आयुक्तों ने 10 माह के दौरान आपत्तियां दर्ज क्यों कराईं? फॉर्म 6 में बदलाव को ‘अवैध’ और ‘अनधिकृत’ करार क्यों दिया? चूंकि चुनाव आयोग के एक प्रेस नोट में कहा गया था कि फॉर्म 6 में बदलाव को सर्वोच्च अदालत की मंजूरी भी थी, जिसे न्यायिक पीठ ने खारिज किया, लिहाजा सवाल यथावत है कि वह बदलाव किसके आदेश पर किया गया? क्या उसमें भी तीनों आयुक्तों की सर्वसम्मति थी? पश्चिम बंगाल में 16 लाख से अधिक फॉर्म 7 के आवेदन सामने आए, जो मतदाताओं के नाम काटने, हटाने के लिए किए गए थे। हलफनामे में जवाब दिया गया कि वह बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) के दफ्तर के स्तर पर किया गया। क्या यह संभव है? सीईओ ने उन 16 लाख लोगों का चयन कैसे और कहां किया? क्या उन्हें कोई ‘आर्थिक लालच’ दिया गया? इतने बड़े स्तर पर मतदाताओं के नाम काटने के आवेदन ‘ऊपर के निर्देश’ के बिना संभव नहीं हैं। इनके अलावा, एसआईआर के दौरान इतनी भयंकर गलतियां और विसंगतियां सामने आई हैं, उनसे लगता है कि चुनाव आयोग आंख मूंद कर और मस्तिष्क की तालाबंदी कर ही काम करता है।

उप्र में ऐसे 3 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम सार्वजनिक किए गए हैं, जो आयोग की नालायकी को बयां करते हैं। किसी एक नाम की 315 अथवा 420 प्रविष्टियां सूची में कर दी गईं। किसी एक नाम की 1300 से अधिक बार मतदाता सूची में ‘एंट्री’ कर दी गई है। इन अक्षम्य गलतियों की शिकायत सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने फरवरी, 2026 में की थी। शुक्र है कि चुनाव आयोग ने 8 महीनों के बाद इन्हें स्वीकार कर लिया और अब फिर ‘शुद्धिकरण’ की कवायद जारी है। उप्र के सीईओ नवदीप रिणवा ने कुछ और विसगतियों तथा भाषायी विद्रूपता पर माफी मांगी है। चुनाव आयोग को कुछ सद्बुद्धि आई है! बहरहाल चुनाव आयोग और एसआईआर से जुड़े जो सवाल और आपत्तियां यथावत बरकरार हैं, अब वे सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन हैं। मंगलवार, 27 अक्तूबर, को सिर्फ इतना ही काम हुआ कि अदालत ने आयोग के हलफनामे पर जवाब देने के लिए याचिकाकर्ताओं को 10 दिन का समय दिया है। अगली तारीख 17 नवंबर है। अदालत कब तक फैसला सुनाएगी, क्या फैसला होगा, क्या छीना गया मताधिकार बहाल हो सकेगा, एसआईआर का भविष्य क्या होगा, ये सब कुछ अनिश्चित हैं। बहरहाल मताधिकार छीनने को लेकर चुनाव आयोग का जो चेहरा बेनकाब हुआ है, उससे असंख्य भारतीयों के मोहभंग हुए होंगे! आयोग की छवि भी दरकी है। चुनाव आयोग ने पहली बार एसआईआर का अभियान शुरू किया था, उसमें यह सवाल उभर कर सामने आया है कि जिन राज्यों में लाखों मतदाताओं के नाम काट दिए गए, फिर चुनाव कराए गए, जनादेश भी आ गया, सरकार भी बन गई, उसके बाद कानूनी समीक्षा में जो नाम पात्र मतदाता साबित हुए और जिनके नाम मतदाता सूची में दर्ज करने पड़े, तो क्या उस जनादेश को ‘समग्र’ माना जाए? चुनाव नतीजों में मतों के जो फासले थे, उनसे अधिक पात्र मतदाता जुड़ गए, तो उस जनादेश को ‘चोरी का जनादेश’ माना जाए? उम्मीद है कि शीर्ष अदालत इस पहलू पर भी विचार करेगी।

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