अंबेडकर का संविधान भारतीय विपक्ष को खतरा

जब तक विपक्षी दल केवल संविधान की रक्षा करने से आगे बढक़र उसके केंद्रीकरण की प्रवृत्तियों को सीमित करने के लिए सुधारों की वकालत नहीं करते, तब तक उन्हें खतरा रहेगा…
भारत की विपक्षी पार्टियों के सामने एक गंभीर दुविधा है : वे एक ऐसे संविधान की रक्षा कर रहे हैं जिसका इस्तेमाल अक्सर उन्हें कमजोर करने के लिए किया जाता है। गणराज्य के शुरुआती वर्षों से ही सत्तारूढ़ दलों ने संविधान में निहित सत्ता के केंद्रीकरण का फायदा उठाकर विपक्ष को हाशिए पर धकेला है। इसके लिए गिरफ्तारियां, चुनावी हेरफेर, विपक्षी समूहों पर प्रतिबंध, विपक्ष-शासित राज्य सरकारों की बर्खास्तगी, और आपत्तियों के बावजूद संसद से कानून पारित कराना जैसी रणनीतियां अपनाई गई हैं।
फिर भी विपक्षी दल शायद ही कभी संविधान की इन संरचनात्मक खामियों को चुनौती देते हैं या सुधारों का प्रस्ताव रखते हैं। उन्हें डर रहता है कि ऐसा करने पर उन्हें ‘एंटी-अंबेडकर’ करार दिया जाएगा और दलित समर्थन खोना पड़ेगा। दलित भारत की आबादी का लगभग 17 फीसदी हैं, यानी 20 करोड़ से अधिक लोग, जो एक निर्णायक चुनावी वर्ग हैं और आज भी बीआर अंबेडकर का गहरा सम्मान करते हैं।
यह हिचकिचाहट महंगी पड़ती है। संविधान की केंद्रीकरण प्रवृत्तियों ने बार-बार विपक्ष की अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने की क्षमता को कमजोर किया है।
कश्मीर इसका एक स्पष्ट उदाहरण है। 1953 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राज्य के संवैधानिक प्रमुख करण सिंह पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर शेख अब्दुल्ला की सरकार को बर्खास्त कर दिया, जब अब्दुल्ला ने उनका विरोध करना शुरू किया। अब्दुल्ला को निवारक नजरबंदी कानूनों के तहत जेल में डाल दिया गया, जिनमें बिना मुकदमे के कैद की अनुमति थी, और वे लगभग 13 साल तक हिरासत में रहे। इस दौरान नेहरू ने राज्य के नेतृत्व को नियंत्रित किया और व्यापक रूप से धांधली माने जाने वाले चुनावों के जरिए वफादार मुख्यमंत्रियों को स्थापित किया। 1981 से 1984 तक राज्यपाल रहे बीके नेहरू ने बाद में लिखा कि 1953 से 1975 तक राज्य के मुख्यमंत्री वास्तव में ‘दिल्ली के नामित’ थे, जिन्हें ‘नाटक और पूरी तरह धांधली वाले चुनावों’ के जरिए वैधता दी गई थी।
नेहरू ने 1962 में अपनी चीन नीति के आलोचकों के खिलाफ भी इसी तरह की कार्रवाई की। ज्योति बसु और सैकड़ों अन्य लोगों को एक निवारक नजरबंदी कानून के तहत गिरफ्तार किया गया, जिसे विपक्ष के कड़े विरोध के बावजूद संसद ने पारित किया था।
1970 के दशक के मध्य में आपातकाल के दौरान यह पैटर्न और तेज हो गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘आंतरिक अशांति’ का हवाला देते हुए अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया और हुक्मनामों के जरिए शासन किया। मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और 1 लाख से अधिक राजनीतिक विरोधियों, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी और जयप्रकाश नारायण शामिल थे, को जेल में डाल दिया गया। उनकी सरकार ने 42वां संशोधन भी पारित किया, जिसने प्रधानमंत्री कार्यालय में सत्ता का केंद्रीकरण काफी बढ़ा दिया। लेकिन उनके ये कदम संविधान की सीमाओं के भीतर थे और कानूनी जवाबदेही से सुरक्षित थे।
1990 के दशक तक संविधान का इस्तेमाल विपक्ष-शासित राज्य सरकारों को भंग करने के लिए भी किया जाता रहा। सरकारिया आयोग ने 1951 से 1987 के बीच राष्ट्रपति शासन के 57 मामलों की समीक्षा की और पाया कि लगभग आधे मामले केंद्र सरकार के हितों से प्रेरित थे। यह प्रथा 1994 में सुप्रीम कोर्ट के बोम्मई फैसले के बाद ही कम हुई, जिसने ऐसे कदमों को न्यायिक समीक्षा के दायरे में ला दिया।
आज की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी अपने प्रतिद्वंद्वियों को कमजोर करने के लिए संवैधानिक तंत्र के इस्तेमाल की इस परंपरा को जारी रखे हुए है। संशोधनों, संघीय ढांचे में बदलाव और प्रशासनिक उपकरणों के जरिए उसने एक ऐसा तंत्र बनाया है, जो विपक्ष की प्रभावी ढंग से काम करने की क्षमता को सीमित करता है।
इसका एक उदाहरण अगस्त में पारित 138वां संशोधन विधेयक है। यह केंद्र सरकार को, केंद्र द्वारा नियुक्त राज्यपालों के माध्यम से, किसी भी ऐसे मुख्यमंत्री या राज्य मंत्री को हटाने की अनुमति देता है, जो लगातार 30 दिनों से अधिक समय तक जेल में रहे। चूंकि केंद्रीय एजेंसियों द्वारा विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी आम है, यह प्रावधान विधायी मंजूरी के बिना ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को हटाने का प्रभावी साधन बन जाता है।
आगामी परिसीमन प्रक्रिया भी एक ऐसा ही संवैधानिक प्रावधान है, जो विपक्षी दलों के लिए खतरा पैदा करता है। 84वें संशोधन द्वारा लागू सीट पुनर्वितरण पर लगी रोक इस वर्ष समाप्त हो रही है, जिसके बाद जनसंख्या में बदलाव के आधार पर संसदीय प्रतिनिधित्व को फिर से निर्धारित किया जाएगा। उत्तरी राज्यों- जिनमें से कई भाजपा के गढ़ हैं- को 43 तक अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं, जबकि तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी राज्यों, जहां विपक्ष मजबूत है, को प्रतिनिधित्व में कमी का सामना करना पड़ सकता है।
इसी तरह, चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (स्ढ्ढक्र) प्रक्रिया ने भी विपक्ष की चिंताएं बढ़ाई हैं। उनका आरोप है कि इससे वैध मतदाताओं- खासतौर पर अल्पसंख्यक और वंचित समुदायों से- को हटाया जा रहा है, जिससे उनके मजबूत क्षेत्रों को और कमजोर किया जा रहा है।
इसके अलावा, विपक्ष-शासित राज्य सरकारों के खिलाफ राज्यपाल के पद का राजनीतिकरण भी एक मुद्दा है। हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में राज्यपालों ने अपने संवैधानिक अधिकारों का उपयोग राज्य के कानूनों को रोकने के लिए किया है, मानो वे प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हों।
इन सभी संरचनात्मक संवैधानिक प्रावधानों को मिलाकर देखा जाए तो एक मजबूत विपक्ष का उभरना बेहद कठिन हो जाता है। भाजपा को खुद सत्ता तक पहुंचने में दशकों लगे, जिसमें उसे व्यापक हिंदू आधार को संगठित करने और आरएसएस की संगठनात्मक ताकत का लाभ मिला। आज के विपक्ष के पास ऐसे तुलनीय फायदे नहीं हैं।
‘संविधान बचाओ’ दांव
संविधान की आलोचना करने में विपक्षी दलों की हिचकिचाहट की जड़ें 2024 के लोकसभा चुनावों में पड़ीं। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने संविधान की छोटी प्रति को एक प्रभावशाली चुनावी प्रतीक बना दिया। चुनाव को ‘संविधान बचाओ’ की लड़ाई के रूप में पेश करके उन्होंने दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के बीच इस आशंका को भुनाया कि भाजपा आरक्षण खत्म कर सकती है या देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को बदल सकती है।
लेकिन इस रणनीति ने एक जाल भी तैयार कर दिया। संविधान को ‘पवित्र’ ग्रंथ का दर्जा देकर विपक्ष ने उसकी अंतर्निहित कमजोरियों की आलोचना करना या यह दिखाना राजनीतिक रूप से लगभग असंभव बना दिया कि उसे कानूनी रूप से कैसे मोड़ा जा सकता है।
जब तक विपक्षी दल केवल संविधान की रक्षा करने से आगे बढक़र उसके केंद्रीकरण की प्रवृत्तियों को सीमित करने के लिए सुधारों की वकालत नहीं करते, तब तक उन्हें उसी लोकतंत्र में स्थायी रूप से हाशिए पर जाने का खतरा रहेगा, जिसे वे बचाना चाहते हैं।-भानु धमीजा




