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युद्ध से ऊर्जा आत्मनिर्भरता प्रयास तेज

कुल मिलाकर, हम कह सकते हैं कि हालांकि ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास पहले से ही चल रहे थे, लेकिन अमरीका और ईरान के बीच युद्ध और उसके परिणामस्वरूप तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई में व्यवधान ने ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा प्रोत्साहन दिया है। हमें इस प्रक्रिया को धीमे नहीं होने देना चाहिए। कच्चे तेल के लिए विदेशों पर हमारी निर्भरता समाप्त करने के लिए देश को व्यापक और संगठित प्रयास करने होंगे। इसके साथ ही आम जनमानस की सोच में भी परिवर्तन लाना आवश्यक होगा। ऊर्जा क्षेत्र में उद्यमियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करना होगा तथा अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के कार्यों में युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी…

लगभग साढ़े तीन महीने के खाड़ी युद्ध के बाद अमरीका और ईरान में शांति समझौते के फलस्वरूप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आवाजाही होती है, अब खुल चुका है। गौरतलब है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने के कारण जहां तेल की आवाजाही बाधित हुई थी, तेल की कीमतें भी भीषण रूप से बढ़ गई थी। कच्चे तेल की कीमत, जो युद्ध से पहले मात्र 70 से 80 डालर प्रति बैरल के आसपास थी, इस दौरान एक बार बढक़र 126 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। हालांकि तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आते रहे, लेकिन यह लगभग 100 डालर प्रति बैरल के आसपास चलती रही। तेल और गैस की आपूर्ति में बाधा के कारण उनकी कमी से तो जनता प्रभावित थी ही, तेल की बढ़ती कीमतों के कारण दुनिया भर में महंगाई बढ़ती जा रही थी। हालांकि अमरीका स्वयं पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति की दृष्टि से आत्मनिर्भर है, फिर भी तेल की इस महंगाई से अमरीका भी अछूता नहीं था। इस संदर्भ में भारत समेत दुनिया भर में अब आयातित तेल पर निर्भरता कम करने की बात चल निकली। इसमें पहला सवाल यह था कि क्या ईंधन में आत्मनिर्भरता संभव है? आज भारत की कच्चे तेल हेतु विदेशों पर निर्भरता लगभग 88 प्रतिशत है और अपनी गैस संबंधी आवश्यकताओं का 50 प्रतिशत हम आयात करते हैं। होर्मुज का मार्ग अवरोध होने के बाद अचानक इन पदार्थों की किल्लत के कारण न केवल उनकी कीमतों पर असर पड़ा, बल्कि हमारे छोटे-छोटे रेस्टोरेंट और रेहड़ी-पटरी पर चाय बेचने वालों से लेकर औद्योगिक प्रतिष्ठानों, जो गैस पर निर्भर थे, उनके व्यवसाय पर असर पडऩा शुरू हो गया।

ऐसे में देश में यह विचार शुरू हुआ कि भारत ईंधन और ऊर्जा की दृष्टि से कैसे आत्मनिर्भर हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशी मुद्रा बचाने हेतु जो सात आग्रह देश की जनता से किए, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, कार पूलिंग और वर्क फ्रॉम होम, सीधे-सीधे पेट्रोलियम उत्पादों पर देश की निर्भरता कम करने की ओर इशारा कर रहे थे। लेकिन समझना होगा कि अल्पकाल में तो हम ऊर्जा का कम उपयोग करके विदेशी मुद्रा बचा सकते हैं, लेकिन दीर्घकाल में ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही एक मात्र विकल्प है। बायो-गैस पेट्रोलियम गैस का एक बहुत बड़ा विकल्प बन सकता है। आज भारत के ऐसे संसाधनों, जिसमें गोबर, कृषि अवशेष, घरेलू कूड़ा इत्यादि कई ऐसे स्रोत हैं जिनसे बायो गैस बनाई जा सकती है, जिसमें से मात्र 5 प्रतिशत ही उपयोग कर पा रहे हैं। स्वाभाविक है कि यदि इस संबंध में प्रयास हों तो हर गांव और ग्राम समूह के स्तर पर बायो गैस प्लांट लगाए जा सकते हैं और उनसे न केवल गांवों की स्थानीय ईंधन आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है, और आयातित गैस पर निर्भरता कम हो सकती है, बल्कि ईंधन की लागत को भी काफी कम किया जा सकता है। यही नहीं वाहनों में थोड़ा बहुत बदलाव करके हम उन्हें भी बायो गैस पर चला सकते हैं। देश में पेट्रोल और डीजल वाहनों के लिए अभी भी अपरिहार्य माना जाता रहा है। लेकिन हम यह भी जानते हैं कि आज से एक दशक पहले तक भारत में बिजली की कमी हुआ करती थी, लेकिन आज पूरे देश में 24 घंटे बिजली की आपूर्ति होने के बाद भी बिजली का अतिरेक रिकार्ड किया जा रहा है। इसके साथ ही साथ पिछले वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की क्षमता में भरपूर वृद्धि हुई है। नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता, जो 2014 में मात्र 35 गीगावाट की थी, अभी तक बढक़र 200 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है और इसमें हर साल 25 से 30 गीगावाट क्षमता जुड़ जाती है।

हालांकि पहले भी बढ़ती ऊर्जा कीमतें हमें ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने की ओर प्रेरित कर रही थीं, लेकिन युद्ध के कारण कीमतों में और बढ़ोतरी और सप्लाई में रुकावटों ने इन प्रयासों को और तेज कर दिया है। बिजली उत्पादन के लिए बड़ी क्षमता स्थापित करने के परिणामस्वरूप, भारत ऊर्जा क्षेत्र में लगभग आत्मनिर्भर हो चुका है, बल्कि हम ऑफ पीक घंटों के दौरान अतिरिक्त बिजली का उत्पादन भी करते हैं। घरेलू उपयोग के लिए सोलर इंस्टॉलेशन पर सब्सिडी के रूप में अधिक प्रोत्साहन मिलने से बिजली उत्पादन की क्षमता और बढ़ेगी। सरकार देश में सोलर उपकरणों और पवन ऊर्जा उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है, जिससे बिजली उत्पादन के लिए क्षमता बढ़ाने की संभावनाएं और बढ़ेंगी। इसलिए, अब पेट्रोल और डीजल वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढऩे का समय आ गया है। हम आसानी से इलेक्ट्रिक बसों, इलेक्ट्रिक ट्रकों, इलेक्ट्रिक कारों और इलेक्ट्रिक स्कूटरों को अपना सकते हैं। इससे भारी मात्रा में पेट्रोल और डीजल की बचत हो सकती है, और इस प्रकार विदेशों पर निर्भरता कम हो सकती है और कीमती विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। आवागमन के अलावा, हम बिजली से चलने वाले खाना पकाने के उपकरणों, जैसे इंडक्शन, का भी अधिक उपयोग कर सकते हैं। देश में परमाणु ऊर्जा उत्पादन के लिए अनुसंधान में नए विकास हमारी ऊर्जा सुरक्षा को और बढ़ा सकते हैं। सरकार बायो-गैस उत्पादन को बड़ा बढ़ावा दे रही है, और अनुसंधान तथा विकास भी बायो गैस को संकुचित (कम्प्रेस) करने में मदद कर रहा है और वाहनों में इसका उपयोग भी संभव हो रहा है। इस तरह के प्रयोग पहले से ही सफल हो रहे हैं।

कुल मिलाकर, हम कह सकते हैं कि हालांकि ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रयास पहले से ही चल रहे थे, लेकिन अमरीका और ईरान के बीच युद्ध और उसके परिणामस्वरूप तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई में व्यवधान ने ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा प्रोत्साहन दिया है। हमें इस प्रक्रिया को धीमे नहीं होने देना चाहिए। कच्चे तेल के लिए विदेशों पर हमारी निर्भरता समाप्त करने के लिए देश को व्यापक और संगठित प्रयास करने होंगे। इसके साथ ही आम जनमानस की सोच में भी परिवर्तन लाना आवश्यक होगा। ऊर्जा क्षेत्र में उद्यमियों को निवेश के लिए प्रोत्साहित करना होगा तथा अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी) के कार्यों में युवाओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी। देश में इलेक्ट्रिक कारों तथा अन्य विद्युत चालित वाहनों को लोकप्रिय बनाने के लिए व्यापक चार्जिंग अवसंरचना का निर्माण भी अनिवार्य है। यद्यपि देश में बिजली का पर्याप्त उत्पादन हो रहा है, फिर भी ग्रिड व्यवस्था की कमियों के कारण कई स्थानों पर बिजली आपूर्ति बाधित होती है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार को विशेष प्रयास करने होंगे। इन सभी चुनौतियों के बावजूद इनमें कुछ भी असंभव नहीं है। यदि सुनियोजित नीति, दृढ़ इच्छाशक्ति और समन्वित प्रयास किए जाएं, तो अगले दस वर्षों में भारत विदेशी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को बड़े पैमाने पर कम कर सकता है। यही आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।-डा. अश्वनी महाजन

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