समझ-समझ का फेर

इसके लिए पहले हमें अपने भीतर झांकना पड़ेगा क्योंकि जो माता-पिता खुद भीतर से घायल हैं, वही अनजाने में अपने बच्चों को भी घायल कर देते हैं। दुख की सबसे बड़ी खासियत यही है- वह वंशानुगत हो जाता है। इसलिए शायद अब समय आ गया है कि हम बच्चों को ‘सुधारने’ की जगह उन्हें ‘स्वीकारना’ सीखें। जब बच्चा गलती करे, तब हम केवल डांटेंगे नहीं, समझेंगे भी। जब वह डर जाए, तब हम केवल सलाह नहीं देंगे, उसके पास बैठेंगे भी। और सबसे जरूरी बात- हम उसे यह एहसास देंगे कि उसका अस्तित्व मूल्यवान है…
बचपन बड़ा अजीब जीव है। बाहर से देखने पर लगता है कि बस छोटा-सा इनसान है, जिसकी जेब में टॉफी, हाथ में गुब्बारा और दिमाग में कार्टून घूम रहे हैं, लेकिन भीतर से देखा जाए तो वही छोटा-सा बच्चा भविष्य का पूरा समाज लेकर घूम रहा होता है। हम जिस बच्चे को आज डांटकर चुप करा देंगे, वही कल किसी ऑफिस में बॉस बनकर दस लोगों को चुप कराएगा, और जिस बच्चे को आज हर बात पर अपमान मिलेगा, वही कल फेसबुक पर लंबी-लंबी पोस्ट लिखकर दुनिया को अपमानित करने का कार्यक्रम चलाएगा। बचपन कोई ‘ट्रायल वर्जन’ नहीं है। यही असली सॉफ्टवेयर है। बाद में तो बस अपडेट आते रहते हैं। इसलिए जब बचपन में किसी बच्चे को बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि वो किसी काम का नहीं है, तब भीतर कहीं एक गांठ पड़ जाती है। बाद के जीवन में वही गांठ कभी दब्बूपन बनकर निकलती है और कभी दबंगई बनकर। हमने अक्सर देखा है कि घरों में बच्चे को सुधारने के नाम पर ऐसा व्यवहार किया जाता है, जैसे बच्चा नहीं, कोई सरकारी फाइल हो जिसे लाल पेन से ठीक करना जरूरी हो। ‘चुप रहो’, ‘बैठो’, ‘उधर मत जाओ’, ‘हंस क्यों रहे हो’, ‘रो क्यों रहे हो’, ‘इतने बेवकूफ कैसे हो सकते हो’, बेचारा बच्चा सोचता होगा कि आखिर करे क्या? फिर एक दिन वही बच्चा बड़ा होकर या तो इतना दब जाता है कि बस ‘जी सर, जी मैडम’ कहते-कहते उसकी आत्मा भी सरकारी बाबू बन जाती है, या फिर वह ऐसा विद्रोही बनता है कि उसे समाज के किसी नियम-कानून की चिंता नहीं रहती। भीतर की चोट कभी गायब नहीं होती, बस उसका मेकअप बदल जाता है। दब्बू बच्चा बड़ा खतरनाक होता है, क्योंकि वह बाहर से शांत दिखाई देता है।




