रूस ने दिया भारत के साथ सीधे रेल मार्ग का प्रस्ताव, क्या हो सकता है रूट; किसे-कितना फायदा?

रूस ने भारत के साथ सीधे रेल मार्ग का प्रस्ताव दिया है। जानिए क्या होगा संभावित रूट, प्रोजेक्ट के भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए मायने और इससे जुड़ी चर्चाओं का इतिहास।
रूस की तरफ से भारत को सीधा रेल रूट के जरिए जोड़ने पर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में रूस के उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने दोनों देशों के बीच एक संभावित रेल लिंक खड़ा करने पर गहराई से विचार की बात कही। उन्होंने इसके लिए विकल्प के तौर पर संभावित कुछ मार्ग भी सुझाए हैं।
मजेदार बात यह है कि रूस और भारत के बीच एक सीधा रेल मार्ग खड़ा करने की यह चर्चाएं कोई नई नहीं हैं। इससे पहले भी दोनों देश व्यापार के लिए रेल आधारित मार्ग बनाने पर बात कर चुके हैं। व्यापार का कुछ हिस्सा रेल मार्ग के जरिए आता-जाता भी है, हालांकि यह मार्ग फिलहाल सीमित है और दोनों देशों के अंदर तक ही स्थित है, न कि अंतर्देशीय है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर रूस की तरफ से भारत के साथ रेल मार्ग स्थापित करने के लिए हाल ही में क्या बयान दिया गया है? मौजूदा समय में दोनों देशों के बीच व्यापार का क्या रूट है? जिस नए रेल मार्ग की बात की जा रही है, उसका संभावित रूट क्या हो सकता है? इसकी जरूरत क्यों महसूस की जा रही है? और इस मार्ग को लेकर चर्चाओं का इतिहास क्या रहा है?
रूस ने भारत के साथ रेल मार्ग स्थापित करने पर क्या बयान दिया?
रूस के शीर्ष नेतृत्व और सरकार ने भारत के साथ सीधे रेल मार्ग को स्थापित करने और कनेक्टिविटी बढ़ाने को लेकर कई रणनीतिक बयान दिए हैं।
सबसे पहले राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने किया था एलान
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले ही बाल्टिक और बेरेंट्स सागर से लेकर सीधे हिंद महासागर तक एक सीधे रेलवे कॉरिडोर को स्थापित करने की विशाल बुनियादी ढांचा योजना की घोषणा कर चुके हैं। रूस के अधिकारियों के मुताबिक, घोषित प्रोजेक्ट का मकसद आधुनिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क तैयार करना है जो मिस्र के पास वाले रास्ते- स्वेज नहर की तुलना में शिपिंग समय को लगभग आधा कर देगा और माल ढुलाई के खर्च को काफी कम करेगा।
अब उप-प्रधानमंत्री ने भी दोहराई रेल मार्ग की बात
ताजा बयान रूस उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन का है, जिन्होंने बीते हफ्ते भारत तक एक सीधे रेल मार्ग के प्रस्ताव को व्यावहारिक बताया और कहा है कि इस रेल लिंक की संभावनाओं को तलाश जाना चाहिए । रूसी सरकार ने इस जमीन-आधारित रेल कॉरिडोर के लिए एक संभावित मार्ग भी साझा किया है।
मौजूदा समय में भारत और रूस के बीच व्यापार का क्या रूट है?
1. पारंपरिक समुद्री मार्ग: स्वेज नहर का रास्ता
यह दोनों देशों के बीच व्यापार का सबसे स्थापित और पुराना समुद्री मार्ग है। इसमें मालवाहक जहाज रूस के सेंट पीटर्सबर्ग से निकल कर बोस्फोरस जलडमरूमध्य, भूमध्य सागर (मेडिटेरेनियन सागर), स्वेज नहर और लाल सागर से होते हुए मुंबई या भारत के अन्य पश्चिमी बंदरगाहों तक पहुंचते हैं। इस मार्ग से सफर पूरा होने में सामान्यतः 40 से 45 दिन या कुछ परिस्थितियों में 45 से 60 दिन का समय लगता है।
2. इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी)
यह समुद्र, रेल और सड़क मार्गों का एक संयुक्त मल्टीमॉडल नेटवर्क है। इसके तहत भारत के मुंबई से माल जहाजों द्वारा ईरान के बंदर अब्बास या चाबहार बंदरगाह तक भेजा जाता है। वहां से ईरान के रेल/सड़क मार्ग और कैस्पियन सागर के रास्ते माल को रूस के मॉस्को या सेंट पीटर्सबर्ग पहुंचाया जाता है।
यह मार्ग पारंपरिक स्वेज नहर वाले मार्ग की तुलना में समय को घटाकर लगभग 20 से 25 दिन कर देता है। इससे माल ढुलाई की लागत में भी लगभग 30% तक की कमी आती है। हालांकि, ईरान पर लगी अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों, पश्चिम एशिया की बिगड़ती स्थिति के चलते इस मार्ग से व्यापार काफी हद तक प्रभावित होता है, जिससे इसका इस्तेमाल पारंपरिक मार्ग से भी कम हो जाता है।
3. चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारा
यह मार्ग भारत के पूर्वी तट (खासकर चेन्नई) को रूस के सुदूर पूर्व में स्थित व्लादिवोस्तोक बंदरगाह से सीधे जोड़ता है। यह मार्ग स्वेज नहर के चक्करदार रास्ते को पूरी तरह बायपास करता है, जिससे समुद्री यात्रा का समय लगभग 18 से 20 दिन रह जाता है, जो कि पारंपरिक पश्चिमी मार्ग से लगभग 40 दिन का रहता है। हालांकि, इस मार्ग का इस्तेमाल भी सीमित व्यापार के लिए ही होता है। फिलहाल इसे कार्गो परिवहन के लिए बेहतर बनाए जाने की कोशिशें जारी हैं, ताकि व्यापार को और बढ़ाया जा सके।
4. उत्तरी समुद्री मार्ग (प्रस्तावित)
रूस अपने नए ट्रांस-आर्कटिक ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (टीएटीसी) के तहत इस आर्कटिक समुद्री मार्ग को तेजी से विकसित कर रहा है। भारत ने भी इस मार्ग में जबरदस्त रुचि दिखाई है। चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे को इस आर्कटिक मार्ग से जोड़कर भविष्य में रूस के उत्तरी क्षेत्रों से भारत के पूर्वी तटों तक कोयला, तेल, गैस और अन्य कच्चे माल की सुरक्षित और तेज आपूर्ति का नया नेटवर्क तैयार किया जा रहा है।
जिस नए रेल मार्ग की बात की जा रही है, उसका संभावित रूट क्या हो सकता है?
रूस और भारत के बीच प्रस्तावित रेल संपर्क के लिए दो संभावित मार्गों की चर्चा की जा रही है, जिनमें से एक पूरी तरह थल-आधारित है और दूसरा मौजूदा कजाखस्तान-ईरान रेल नेटवर्क पर आधारित है।
पहला मार्ग: भारत-रूस के बीच रेल रूट
रूसी उप-प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन की ओर से सुझाया गया मार्ग पूरी तरह से जमीन के रास्ते भारत को रूस से जोड़ेगा। इसका संभावित भौगोलिक रूट रूस से तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान के रास्ते भारत आ सकता है। हालांकि, पाकिस्तान के साथ भारत की दूरियों के मद्देनजर उसे बायपास करने पर विचार किया जा सकता है।
दूसरा मार्ग: उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर में बदलाव
एक अन्य समानांतर मार्ग जो रूस के व्यापक कनेक्टिविटी प्रस्ताव और मौजूदा इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल करेगा, उसका रूट रूस के मॉस्को से शुरू होकर कजाखस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान के बंदर अब्बास या चाबहार बंदरगाह से होते हुए भारत के मुंबई तक आ सकता है।
इसके लिए रेल मार्ग मॉस्को से शुरू होकर कजाखस्तान और तुर्कमेनिस्तान के मौजूदा रेल नेटवर्कों से गुजरेगा। तुर्कमेनिस्तान से ट्रेन ईरान के मौजूदा रेल नेटवर्क में प्रवेश करेगी। यह रेल नेटवर्क ईरान के अंदर दक्षिण की ओर बढ़ते हुए सीधे बंदर अब्बास या नवनिर्मित चाबहार-जाहेदान रेल लाइन के जरिए चाबहार बंदरगाह तक पहुंचेगा। फिलहाल ईरान के बंदरगाहों से भारत तक माल भेजने के लिए समुद्री जहाजों का इस्तेमाल होता है। हालांकि, भविष्य के रेल विस्तार में अफगानिस्तान के रास्ते सीधे भारत तक थल रेल संपर्क बनाने की योजना भी इस प्रस्ताव का हिस्सा बन सकती है।
भारत-रूस के बीच रेल मार्ग स्थापित करने पर क्यों दिया जा रहा जोर?
1. वैश्विक समुद्री मार्गों का बढ़ता जोखिम
होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट: अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच सैन्य संघर्ष की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव काफी बढ़ गया है, जिसके चलते वहां जहाजों की आवाजाही बाधित हुई है। चूंकि दुनिया का लगभग 20% से 25% कच्चा तेल और लगभग 20% एलएनजी शिपमेंट इसी संकीर्ण रास्ते से गुजरता है, इसलिए इस चोकपॉइंट का असुरक्षित होना वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है।
बोस्फोरस जलडमरूमध्य में व्यवधान: दूसरी तरफ काला सागर में चल रहे रूस-यूक्रेन सैन्य संघर्ष की वजह से वहां भी वाणिज्यिक जहाजों पर हमले बढ़े हैं। तुर्किये के नियंत्रण वाले बोस्फोरस जलडमरूमध्य में बढ़ते जोखिमों के चलते रूस को भारत तक सुरक्षित व्यापार जारी रखने के लिए वैकल्पिक मार्गों की आवश्यकता महसूस हो रही है।
ऐसे में रूस की तरफ से प्रस्तावित जमीन-आधारित रेल मार्ग इन दोनों संवेदनशील समुद्री रास्तों को पूरी तरह बायपास कर देगा, जिससे युद्ध के समय नाकेबंदी और प्रतिबंधों का खतरा खत्म किया जा सकता है।
2. भारत की ऊर्जा सुरक्षा और तेल आयात का संकट
चीन के बाद भारत मौजूदा समय में रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बन चुका है। हाल ही में भारत का रूस से तेल आयात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जो भारत की कुल कच्चे तेल खरीद का 55% है। इसकी एक बड़ी वजह पश्चिम एशिया में अशांति की स्थिति है। ऐसे में भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए रूस के साथ एक ऐसे सुरक्षित जमीनी मार्ग की जरूरत है, जो बिना किसी रुकावट के कच्चे तेल और अन्य उत्पादों की आपूर्ति सुनिश्चित कर सके।
3. 100 अरब के द्विपक्षीय व्यापार का लक्ष्य
- भारत और रूस के बीच राजनयिक और आर्थिक संबंध बेहद पुराने और मजबूत रहे हैं। दोनों देशों ने आपसी व्यापार को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए साल 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है।
- थल-आधारित रेलवे कॉरिडोर तैयार होने से समुद्री जहाजों के मुकाबले इन्हें लाने-ले जाने के समय में भारी बचत होगी। साथ ही इससे समुद्री बीमा दरों के उतार-चढ़ाव से राहत मिलेगी और व्यापारिक गतिविधियां ज्यादा स्थिर बनी रहेंगी।
- 4. रेलवे विनिर्माण और औद्योगिक सहयोग में बढ़ोतरी
- भारत और रूस के बीच रेलवे के क्षेत्र में पहले से ही गहरा औद्योगिक जुड़ाव चल रहा है। रूसी इंजीनियरिंग दिग्गज ट्रांसमैशहोल्डिंग (टीएमएच) भारत में 1,920 वंदे भारत स्लीपर कोच के उत्पादन और रखरखाव के लिए ₹55,000 करोड़ के बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रही है।
- हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित भारत-रूस वर्किंग ग्रुप ऑन मॉडर्नाइजेशन एंड इंडस्ट्रियल कॉर्पोरेशन की बैठक में रेलवे बुनियादी ढांचे, वीनिर्माण, और सिग्नलिंग प्रणालियों पर सहयोग को और गति देने पर जोर दिया गया है।
- 5. भविष्य का सांस्कृतिक जुड़ाव और पर्यटन
- वैसे तो जिस रेल मार्ग के लिए गलियारे पर बात हो रही है, वह पूरी तरह माल ढुलाई और व्यापार पर केंद्रित है, लेकिन लंबी अवधि में जमीन-आधारित रेल कनेक्टिविटी स्थापित होने से दोनों देशों के बीच पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के नए दरवाजे खुल सकते हैं।




