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सशक्त राज्यसभा परिसीमन विवाद के समाधान की कुंजी

भारत को परिसीमन के साथ-साथ ऐसा संवैधानिक सुधार भी करना चाहिए, जिससे राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित हो…

भारत एक बार फिर एक ऐसे संवैधानिक प्रश्न के सामने खड़ा है, जो उसके संघीय ढांचे की मजबूती की परीक्षा ले सकता है। भाजपा सरकार ने संकेत दिया है कि वह संसद के आगामी सत्र में परिसीमन (डिलिमिटेशन) का मुद्दा फिर से उठाएगी। नवीनतम जनगणना के आधार पर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण संविधान के अनुसार आवश्यक है, किंतु यह राजनीतिक रूप से अत्यंत विस्फोटक विषय भी है। परिसीमन के परिणामस्वरूप जनसंख्या की दृष्टि से बड़े उत्तरी राज्यों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व दक्षिणी, पश्चिमी तथा छोटे राज्यों की तुलना में काफी बढ़ जाएगा। इन आशंकाओं का समाधान करने और राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए भारत को उस संस्था की ओर देखना चाहिए, जिसका निर्माण विशेष रूप से राज्यों और क्षेत्रों के हितों की रक्षा के लिए किया गया था- राज्यसभा।

सरकार का परिसीमन को आगे बढ़ाने का पहला प्रयास मात्र दो महीने पहले ही विफल हो गया, जबकि उसे व्यापक रूप से लोकप्रिय महिला आरक्षण के मुद्दे से जोड़ा गया था। प्रस्ताव था कि निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण के बाद महिलाओं के लिए अधिक आरक्षण लागू किया जाए। विपक्षी दल इस विधेयक के विरोध में एकजुट हो गए। उनका तर्क था कि इससे अधिक जनसंख्या वाले हिंदी भाषी राज्यों- जहां भाजपा को मजबूत समर्थन प्राप्त है- को असंगत लाभ मिलेगा, जबकि वे राज्य जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया और जनकल्याण में भारी निवेश किया, उन्हें दंडित किया जाएगा।

वास्तव में परिसीमन की बहस दो समान रूप से वैध सिद्धांतों के बीच टकराव है- लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन। 1976 से लोकसभा की सीटें वस्तुत: 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर बनी हुई हैं। यदि इस स्थगन को बिना किसी अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था के समाप्त कर दिया गया, तो यह शून्य-योग (जीरो-सम) की प्रतिस्पर्धा बन जाएगी। उत्तरी राज्य अपनी बढ़ी हुई जनसंख्या के अनुरूप अधिक सीटों की मांग करने के पूर्णत: अधिकारी होंगे, क्योंकि यही ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के लोकतांत्रिक सिद्धांत की मांग है। दूसरी ओर, दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों का राजनीतिक प्रभाव घट जाएगा, जबकि उन्होंने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में असमानुपातिक योगदान दिया है और जनसंख्या नियंत्रण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के छोटे राज्यों का महत्व और भी कम हो सकता है।

इस असंतुलन का समाधान केवल लोकसभा के भीतर संभव नहीं है। यदि संसद लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ा भी दे, तब भी जनसंख्या आधारित वितरण उन राज्यों के सापेक्ष प्रभाव को कम कर देगा जिन्होंने विकास और जनसांख्यिकीय संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन किया है। संविधान-निर्माताओं ने राज्यसभा की कल्पना ‘राज्यों की परिषद’ के रूप में की थी। व्यवहार में, हालांकि, उसकी संरचना भी लोकसभा की तरह मुख्यत: जनसंख्या आधारित है। संविधान की चौथी अनुसूची के अंतर्गत राज्यों को राज्यसभा की सीटें मुख्यत: उनकी जनसंख्या के अनुपात में आवंटित की जाती हैं। परिणामस्वरूप, बड़े राज्यों का संसद के दोनों सदनों पर प्रभुत्व स्थापित हो जाता है और राज्यसभा अपनी वास्तविक संघीय भूमिका निभाने में असफल रहती है। इसलिए भारत को परिसीमन के साथ-साथ ऐसा संवैधानिक सुधार भी करना चाहिए, जिससे राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व अधिक संतुलित हो। इसके लिए अन्य संघीय व्यवस्थाओं से प्रेरणा ली जा सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या चाहे जितनी भी हो, सीनेट में समान प्रतिनिधित्व प्राप्त है। जर्मनी का बुंडेसराट एक स्तरीय (टियर) व्यवस्था अपनाता है, जो बड़े राज्यों के प्रभुत्व को सीमित करते हुए जनसंख्या के अंतर को भी कुछ सीमा तक स्वीकार करती है। भारत को इनमें से किसी मॉडल की हूबहू नकल करने की आवश्यकता नहीं है, किंतु वह उनके मूल सिद्धांत को अवश्य अपना सकता है- यह सुनिश्चित करना कि राज्यों को उनकी जनसंख्या से स्वतंत्र एक सार्थक संस्थागत संरक्षण प्राप्त हो।

ऐसी व्यवस्था में लोकसभा जनसंख्या की वास्तविकताओं को अधिक सटीक रूप से प्रतिबिंबित कर सकेगी, जिससे उत्तर भारत की लोकतांत्रिक अपेक्षाएं पूरी होंगी। साथ ही, समान या सावधानीपूर्वक संतुलित राज्य प्रतिनिधित्व वाली एक पुनर्गठित राज्यसभा छोटे तथा कम जनसंख्या वाले राज्यों के हितों की प्रभावी रक्षा कर सकेगी। इस सुधार को लागू करने के लिए बहु-स्तरीय संवैधानिक रणनीति की आवश्यकता होगी। पहला कदम यह होना चाहिए कि राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व को कठोर जनसंख्या-आधारित सूत्र से अलग किया जाए। एक विकल्प यह हो सकता है कि प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व दिया जाए। दूसरा विकल्प यह है कि प्रत्येक राज्य को न्यूनतम निश्चित संख्या में सीटें दी जाएं और उसके बाद जनसंख्या के विभिन्न स्तरों (स्लैब) के आधार पर अतिरिक्त सीटें आवंटित की जाएं, किंतु उन पर अधिकतम सीमा भी निर्धारित हो। ऐसी व्यवस्था किसी एक राज्य को सदन पर प्रभुत्व स्थापित करने से रोकेगी।

दूसरा, राज्यसभा की शक्तियों को भी सुदृढ़ किया जाना चाहिए। वर्तमान व्यवस्था में धन विधेयक (मनी बिल) प्रभावी रूप से राज्यसभा को दरकिनार कर सकते हैं। परिसीमन के बाद, जब केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व वितरण तथा वित्तीय हस्तांतरण के प्रश्न और अधिक विवादास्पद हो सकते हैं, तब राज्यसभा को ऐसे प्रमुख वित्तीय विधेयकों पर या तो संयुक्त निर्णय का अधिकार दिया जाना चाहिए अथवा अनिवार्य समीक्षा का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए।

इन सुधारों के संयुक्त परिणामस्वरूप एक व्यापक संघीय समझौता (ग्रैंड फेडरल बार्गेन) संभव होगा। उत्तर भारत को उसकी जनसंख्या के अनुरूप लोकसभा में प्रतिनिधित्व मिलेगा, जबकि दक्षिण, पश्चिम और छोटे राज्यों को राज्यसभा में अधिक मजबूत संस्थागत सुरक्षा प्राप्त होगी।

ऐसा दृष्टिकोण केवल राजनीतिक दृष्टि से व्यावहारिक ही नहीं, बल्कि न्यायसंगत भी है। जिन राज्यों ने जनसंख्या स्थिरीकरण, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक विकास जैसे राष्ट्रीय लक्ष्यों को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया है, उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए। ऐसा करना यह चिंताजनक संदेश देगा कि प्रभावी शासन का परिणाम राजनीतिक हाशिए पर पहुंचना है।

एक अधिक सशक्त राज्यसभा राष्ट्रीय विमर्श को उत्तर बनाम दक्षिण जैसी विभाजनकारी बहस से भी बाहर निकाल सकती है। तब यह विवाद क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा न रहकर संस्थागत शक्तियों के संतुलन का प्रश्न बन जाएगा। पुनर्गठित राज्यसभा लोकसभा के बहुमतवाद तथा कार्यपालिका की निरंकुश प्रवृत्तियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने का भी अधिक सक्षम माध्यम बन सकती है।

समान प्रतिनिधित्व के लोकतांत्रिक सिद्धांत को कमजोर किए बिना परिसीमन को अनिश्चितकाल तक टालना संभव नहीं है। किंतु यदि इसे केवल लोकसभा के माध्यम से लागू किया गया, तो इससे उस संघीय विश्वास को आघात पहुंच सकता है जो भारतीय संघ को एकजुट रखता है। राज्यसभा को वास्तव में राज्यों के सदन में परिवर्तित करके भारत लोकतंत्र और संघवाद के बीच संतुलन स्थापित कर सकता है- जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व का सम्मान करते हुए क्षेत्रीय संतुलन को भी सुरक्षित रख सकता है। अब समय आ गया है कि राज्यों की परिषद वास्तव में अपने नाम के अनुरूप बने- भारत के विविध क्षेत्रों के लिए एक स्थायी सुरक्षा-कवच और राष्ट्रीय एकता का एक मजबूत आधार।-भानु धमीजा

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