28 साल के इतिहास के सबसे गंभीर संकट से जूझ रही TMC, क्या ममता बनर्जी बचा पाएंगी पार्टी?

पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने और विधानसभा में 58 विधायकों के विद्रोह के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) एक ऐसे प्रश्न का सामना कर रही है जो कुछ समय पहले तक असंभव माना जाता था, क्या यह पार्टी अब अपने अस्तित्व को बचा पाएगी जिस पर लगभग तीन दशकों से ममता बनर्जी की मजबूत पकड़ रही है? करीब 28 वर्षों से तृणमूल की आंतरिक व्यवस्था एक ही सिद्धांत पर टिकी रही—पार्टी और नेता ममता बनर्जी एक-दूसरे के पर्याय हैं। लेकिन अब पहली बार यह समीकरण गंभीर चुनौती के घेरे में है।
पार्टी के भीतर शुरू हुआ असंतोष अब विधानसभा से आगे बढ़कर सांसदों तक पहुंचने की आशंका पैदा कर रहा है। साथ ही नेतृत्व, उत्तराधिकार और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर भी गहरे मतभेद सामने आ रहे हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि पार्टी के प्रतीक ‘जोरा घास फूल’ (फूल और घास) पर नियंत्रण को लेकर भी भविष्य में विवाद की संभावना जताई जा रही है।
ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी से समस्या
तृणमूल 1998 में अस्तित्व में आने के बाद से अपने 28 साल के इतिहास में सबसे बड़े संकट का सामना कर रही है। कांग्रेस से अलग हो कर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। तृणमूल कांग्रेस के भीतर यह संकट केवल सत्ता से बाहर होने का नहीं बल्कि नेतृत्व की एकछत्र सत्ता पर उठे सवालों का है। हालांकि असंतुष्ट विधायक अब भी ममता बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन ममता के भतीजे और राजनीतिक उत्तराधिकारी माने जाने वाले अभिषेक बनर्जी के प्रति खुला विरोध सामने आया है।
राज्यसभा और लोकसभा तक हो सकता है असर
पार्टी के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि जो लोग ममता बनर्जी का साथ छोड़ रहे हैं, उनका राजनीतिक अस्तित्व उनके बिना नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने आशंका जताई है कि असंतोष का यह माहौल आगे चलकर संसद तक फैल सकता है। हालांकि पार्टी नेतृत्व का दावा है कि अभी सांसदों के बीच किसी संगठित विद्रोह के संकेत नहीं हैं, लेकिन यह चिंता गहराती जा रही है कि विधानसभा का संकट लोकसभा और राज्यसभा तक जा सकता है।
शिवसेना जैसा हाल, पर ममता बनर्जी कुछ अलग
तृणमूल के पास वर्तमान में लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं, और किसी भी तरह की टूट से विपक्षी राजनीति में उसका प्रभाव कमजोर हो सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह संकट महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में हुए विभाजन से मिलता-जुलता दिखता है, जहां विधायक संख्या और संगठनात्मक नियंत्रण के आधार पर राजनीतिक दल टूट गए थे। हालांकि तृणमूल के मामले में ममता बनर्जी की सक्रिय राजनीतिक मौजूदगी और जनाधार इसे अलग बनाता है।
फिर भी विश्लेषकों का कहना है कि महाराष्ट्र की घटनाएं चेतावनी के रूप में सामने हैं, जहां शुरुआत में नेताओं ने संगठन पर भरोसा जताया था, लेकिन अंततः उन्हें विधायकों और कानूनी लड़ाई के बीच संघर्ष करना पड़ा।




