महाराष्ट्र

जो महिला पति की परवाह नहीं करती, वह बच्चे की क्या करेगी? पुणे कोर्ट ने सिंगापुर के पिता को दी बेटे की कस्टडी

पुणे : बच्चों की कस्टडी का फैसला सामान्यता मां के पास जाता है। एक बच्चा भी अपनी मां के पास सुरक्षित महसूस करता है और उनके पास ही रहना चाहती है। लेकिन पुणे के एक केस में उल्टा हुआ। फैमिली कोर्ट पुणे ने सिंगापुर में रहने वाले पिता को एक नाबालिग लड़के की अंतरिम कस्टडी (देखभाल का अधिकार) सौंपने का आदेश दिया है। कोर्ट ने पाया कि बच्चे की भलाई पिता के साथ रहने में ही है, क्योंकि मां ने सिंगापुर और भारत, दोनों देशों की अदालतों के आदेशों को नहीं माना और बार-बार पिता को बच्चे से मिलने से रोका।

2012 में हुई थी कपल की शादी

पुणे के एक कपल की शादी 2012 में हुई थी और मार्च 2016 में उनका एक बेटा हुआ। यह परिवार 2022 में सिंगापुर चला गया, जहां पिता एक टेक कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर काम करते थे और बच्चे का दाखिला एक इंटरनेशनल स्कूल में कराया गया था।

2025 में बच्चे को सिंगापुर से पुणे ले आई मां

मार्च 2025 में, जब पिता एक बिज़नेस ट्रिप पर बाहर गए थे, तो मां चुपके से बच्चे को वापस पुणे ले आईं और उसे एक लोकल स्कूल में भर्ती करा दिया। उन्होंने पिता को इसकी जानकारी नहीं दी और बच्चे को सिंगापुर वापस भेजने से इनकार कर दिया।

पिता ने कोर्ट में किया केस

पिता ने सिंगापुर और भारत, दोनों जगह कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सिंगापुर की फैमिली कोर्ट ने जुलाई 2025 में उनके पक्ष में कस्टडी का अंतिम आदेश सुनाया और मां को बच्चे को वापस भेजने का निर्देश दिया। मां ने न तो इस आदेश को चुनौती दी और न ही इसका पालन किया। पुणे में, पिता ने ‘गार्जियनशिप एंड वार्ड्स एक्ट’ के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने मई 2025 में एक शुरुआती आदेश दिया, जिसे पिता ने बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी। हाई कोर्ट ने उस आदेश को रद्द कर दिया और फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह बच्चे की भलाई को मुख्य आधार मानते हुए मामले पर नए सिरे से फैसला करे।

पिता को बच्चे से कहलवाया शैतान

फैमिली कोर्ट के प्रभारी जज गणेश घुले ने कई आधारों पर पिता को अंतरिम कस्टडी सौंप दी। कोर्ट की मुख्य चिंता यह थी कि मां लगातार अदालती आदेशों की अवहेलना कर रही थीं। पिता को बच्चे से मिलवाने के लिए नियुक्त किए गए कोर्ट कमिश्नर ने बताया कि मां की तरफ से कोई सहयोग नहीं मिला। जज ने पाया कि बच्चे पर दबाव डालकर पिता को शैतान कहने के लिए मजबूर किया गया था और कथित तौर पर उसे यह कहने के लिए कहा गया था कि वह अपने पिता को जिंदा नहीं देखना चाहता।

कोर्ट ने क्या कहा

कोर्ट ने कहा कि 10 साल के बच्चे का मौत के बारे में लिखना, ऐसे माहौल में रहने से पैदा हुई परेशानी को दर्शाता है। जज ने कहा कि अगर किसी को अपने ही बच्चे से मिलने और बात करने के लिए गिड़गिड़ाना और मिन्नतें करनी पड़ें, तो इससे ज्यादा दर्दनाक कुछ नहीं हो सकता। सिंगापुर कोर्ट के आदेश पर जज घुले ने कहा कि चूंकि मां ने न तो इसे चुनौती दी थी और न ही इसमें कोई कानूनी कमी बताई थी, इसलिए वह इसे नजरअंदाज़ नहीं कर सकती थीं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे अदालती आदेश को नजरअंदाज़ करना मंजूर नहीं है और कहा कि अदालती आदेश सिर्फ कागजी आदेश बनकर नहीं रह जाने चाहिए।

सिंगापुर में बच्चे का था अच्छा फ्यूचर

कोर्ट ने सिंगापुर में बच्चे की पृष्ठभूमि पर भी गौर किया, जहां वह लगभग तीन साल तक रहा था, कैम्ब्रिज-करिकुलम वाले स्कूलों में पढ़ा था, और वहां दोस्त बनाए थे और अपनी दिनचर्या बना ली थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पिता एक लीडरशिप रोल में थे और बच्चे की दादी उसकी देखभाल के लिए मौजूद थीं। कोर्ट ने पिता के खिलाफ घरेलू हिंसा, एक्स्ट्रा-मैरिटल अफ़ेयर और वर्कप्लेस पर गलत व्यवहार के मां के आरोपों पर भी बात की, लेकिन इस स्टेज पर उन पर कोई फैसला देने से इनकार कर दिया, यह कहते हुए कि पूरी सुनवाई के दौरान उनकी जांच की जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि बुरे चरित्र वाला व्यक्ति अपने-आप में बुरा पिता नहीं होता।

कोर्ट ने कहा कि शादी की कसमें निभाना, पति का शारीरिक और भावनात्मक रूप से ख्याल रखना, उनके लिए प्रार्थना करना और हर चीज में उनकी भलाई चाहना उम्मीद की जाती है, लेकिन उसने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जैसे वह और उनका परिवार उसकी सात पीढ़ियों के दुश्मन हों। इसलिए, ऐसी महिला के साथ बच्चे का भविष्य सुरक्षित नहीं है। जज ने उन चीजों की सूची बनाई जिन्हें वह पत्नी के कर्तव्य मानते थे और कहा कि जो महिला इन कर्तव्यों को पूरा नहीं करती, उस पर बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता। इसके बाद कोर्ट ने मां को तुरंत बच्चे को पिता को सौंपने का निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ किया कि यह आदेश अस्थायी था और इसका केस के अंतिम नतीजे पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

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