दुनिया मेरे आगे | पति की मृत्यु से क्यों बदल जाती है एक स्त्री की सामाजिक पहचान?

हमारे समाज में कुछ परंपराओं को लोग सही मानना इसलिए शुरू कर देते हैं, क्योंकि वे पुरानी हैं। उनके औचित्य पर सवाल उठाना तो दूर, यह पूछना भी जरूरी नहीं समझा जाता है कि इसके तहत जो होता है, उसका आधार क्या है। विवाह और दूसरे शुभ अवसरों से जुड़ी कई मान्यताओं को इस श्रेणी में देखा जा सकता है।
आज भी समाज के कुछ हिस्सों में यह धारणा दिखाई देती है कि पति को खो चुकी स्त्री शुभ अवसरों से दूरी बनाए रखे। उसकी उपस्थिति तक को अपशकुन की दृष्टि से देखा जाता है। सवाल केवल एक रस्म का नहीं है। सवाल यह है कि क्या पति की मृत्यु के साथ एक स्त्री सामाजिक रूप से शुभ नहीं रह जाती? अगर ऐसा है तो फिर उस स्त्री के जीवनभर के संघर्ष का मूल्यांकन किस आधार पर होगा?
वह मां, जिसने अपने बच्चों को अकेले बड़ा किया और पति की अनुपस्थिति में घर और बाहर, दोनों मोर्चे संभाले। उसने अपनी इच्छाओं को पीछे रखकर बच्चों की पढ़ाई, नौकरी, विवाह और भविष्य के लिए जीवन खपा दिया। बीमारी, आर्थिक संकट, सामाजिक दबाव और अकेलेपन के बावजूद बच्चों को टूटने नहीं दिया।
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क्या वह स्त्री केवल इसलिए अशुभ हो गई कि उसका पति अब इस दुनिया में नहीं है? यहां हमारी सामाजिक मानसिकता का एक गहरा विरोधाभास सामने आता है। पति जीवित है, तो वह सुहागन और शुभ है। पति की मृत्यु के बाद वही स्त्री अचानक ऐसी श्रेणी में रख दी जाती है, जहां उसे कुछ लोग शुभ अवसरों के लिए अनुपयुक्त मानते हैं।
यह केवल अंधविश्वास नहीं, स्त्री की पहचान को पुरुष से जोड़कर और उस पर निर्भर देखने वाली उस मानसिकता का विस्तार है, जो सदियों से हमारे सामाजिक ढांचे में मौजूद रही है। विडंबना यह भी है कि जिस स्त्री को पति की मृत्यु के बाद सबसे अधिक सहारे की आवश्यकता होती है, उसी समय समाज उसके चारों ओर कई अदृश्य दीवारें खड़ी कर देता है।
उससे अपेक्षा की जाती है कि वह अपने दुख को निजी रखे, सामाजिक जीवन में संयमित रहे। कल्पना कीजिए उस मां की, जिसने अपने बेटे या बेटी की हर छोटी-बड़ी खुशी में अपना जीवन लगा दिया। उनके बचपन से युवावस्था तक हर पड़ाव देखा और जब वही बच्चा विवाह के मंडप तक पहुंचता है, तब मां को यह एहसास कराया जाता है कि वह कुछ रस्मों का हिस्सा बनने के योग्य नहीं है। वह मां क्या महसूस करती होगी?
शायद वह कुछ कहे भी नहीं, क्योंकि हमारे समाज ने महिलाओं को दर्द सहना तो सिखाया है, लेकिन अपने दर्द पर सवाल उठाना नहीं। और यही चुप्पी इन परंपराओं को जीवित रखती है।
किसी महिला का पति नहीं रहा, तो यह उसके जीवन की त्रासदी है, उसकी पहचान नहीं। मृत्यु किसी रिश्ते को समाप्त कर सकती है, लेकिन उससे जुड़े व्यक्ति की मनुष्यता, मातृत्व और अधिकार समाप्त नहीं कर सकती। फिर भी हमारी सामाजिक भाषा में ‘विधवा’ शब्द कई बार महिला के पूरे व्यक्तित्व पर भारी पड़ जाता है। उसके नाम, संघर्ष और उसकी उपलब्धियों से पहले उसका वैवाहिक दर्जा दिखाई देता है।
कुछ स्थानों पर आज भी ‘विधवा’ स्त्री के वस्त्र, व्यवहार और सामाजिक भागीदारी तक पर अनावश्यक निगरानी दिखाई देती है। जबकि इसी समाज में पत्नी को खो चुके पुरुष के लिए नियम इतने कठोर नहीं होते। उसके सामान्य जीवन जीने, सामाजिक आयोजनों में शामिल होने या दोबारा विवाह करने का अधिकार सहज रूप से स्वीकार कर लिया जाता है। स्त्री के लिए मानदंड बदल जाते हैं। समस्या किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति में नहीं, बल्कि उस दृष्टि में है, जिससे समाज पुरुष और स्त्री का मूल्यांकन करता है।
पुरुष के लिए पत्नी की मृत्यु जीवन की एक घटना है। स्त्री के लिए पति की मृत्यु सामाजिक पहचान का संकट बना दी जाती है। क्या शोक का भी कोई लैंगिक स्वरूप होता है? क्या पति की मृत्यु से पुरुष का शुभ-अशुभ प्रभावित नहीं होता, लेकिन स्त्री का हो जाता है? ये नियम किस तर्क पर टिके हैं? इन सवालों का जवाब हमें अपनी सामाजिक मानसिकता में खोजना होगा।
परंपरा का अर्थ यह नहीं कि उसे बिना समझे पीढ़ी-दर-पीढ़ी दोहराया जाए। परंपरा तभी जीवित और सार्थक रह सकती है, जब वह समय के साथ मनुष्य की गरिमा और संवेदना के अनुरूप बदलती रहे। बाल विवाह कभी सामाजिक स्वीकृति प्राप्त व्यवस्था थी। स्त्री शिक्षा को लेकर भी समाज में कभी गंभीर आपत्तियां थीं। मगर समय ने सवाल किए और समाज बदला। फिर शुभ-अशुभ की उन धारणाओं पर सवाल क्यों नहीं किए जा सकते, जो किसी जीवित स्त्री को उसके ही परिवार की खुशी से दूर करती हैं?
किसी रस्म को निभाने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह मनुष्य को सम्मान दे रही है या अपमान। एक स्त्री की गरिमा, उसका मान-सम्मान सिर्फ पति के होने से ही नहीं होता है। उसके बाद भी है। परिवारों को यह साहस दिखाना होगा कि वे उन परंपराओं को स्वीकार न करें, जो उनके अपने किसी सदस्य, किसी स्त्री को अपमानित करती हैं।
जिस परंपरा को बचाने के लिए किसी मां या किसी स्त्री को सम्मान खोना पड़े, उस परंपरा को बचाना नहीं, उससे मुक्त होना ही समाज की वास्तविक प्रगति है। यह भी जरूरी है कि इस प्रश्न को केवल महिलाओं का प्रश्न मानकर छोड़ न दिया जाए। यह पूरे परिवार और समाज का प्रश्न है। हमने समाज में अनेक कुरीतियों पर प्रश्न उठाए हैं। बाल विवाह, सती प्रथा, दहेज, अस्पृश्यता और स्त्री शिक्षा से जुड़े अनेक पुराने विचारों को चुनौती दी गई। आज कोई समाज तभी प्रगतिशील कहलाएगा, जब वह उन अदृश्य भेदभावों पर भी सवाल उठाए, जो धार्मिक या सांस्कृतिक आड़ में अब तक बचे हुए हैं।




