राजनीति

जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा : क्या अधर में रहेगा…

संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू होते ही विरोध-प्रदर्शनों का दौर भी तेज हो गया और देशभर का राजनीतिक ध्यान संसद की ओर केंद्रित हो गया। इस शोर-शराबे के बीच एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा अपेक्षाकृत दब गया। जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ नैशनल कॉन्फ्रैंस (नैकां) ने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग दोहराते हुए मोदी सरकार से संसद और सर्वोच्च न्यायालय में किए गए अपने वादे को निभाने की अपेक्षा जताई। विशेष रूप से वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद 2024 में शांतिपूर्ण ढंग से हुए विधानसभा चुनावों ने लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक गतिरोध को समाप्त किया। भारतीय जनता पार्टी लगातार आतंकवादी घटनाओं में कमी और पर्यटन में उल्लेखनीय वृद्धि को ‘नया कश्मीर’ में सामान्य स्थिति लौटने का प्रमाण बताती रही है।

ऐसे में राज्य का दर्जा बहाल करने में हो रही देरी को लेकर नैशनल कॉन्फ्रैंस की निराशा बढ़ती जा रही है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा, ‘‘भाजपा हमें यह बता दे कि राज्य का दर्जा हासिल करने के लिए क्या हमें अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पास जाना होगा और व्हाइट हाऊस के बाहर धरना देना होगा?’’ यदि वास्तव में कश्मीर आज पूर्ण लोकतांत्रिक स्वशासन के लिए पर्याप्त रूप से सामान्य हो चुका है, तो फिर राज्य का दर्जा बहाल करने में बाधा क्या है? आखिर ऐसा कौन-सा मानदंड है, जो अभी तक पूरा नहीं हुआ? संक्षेप में कहें तो सबसे बड़ी बाधा संवैधानिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक है। केंद्र सरकार बार-बार यही कहती रही है कि जम्मू-कश्मीर को ‘उचित समय’ पर राज्य का दर्जा दिया जाएगा। असली विवाद इस बात को लेकर है कि वह उचित समय कब आएगा और किन परिस्थितियों में यह निर्णय लिया जाएगा?

केंद्र की हिचकिचाहट का सबसे बड़ा कारण सुरक्षा संबंधी चिंताएं हैं। सरकार का मानना है कि यद्यपि सुरक्षा स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ है लेकिन यह सुधार अभी पूरी तरह स्थायी नहीं माना जा सकता। आखिरकार जम्मू-कश्मीर दशकों तक आतंकवाद, सीमा पार घुसपैठ और पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का सामना करता रहा है। पहलगाम आतंकी हमले के घाव अभी भी पूरी तरह भरे नहीं हैं। इस मुद्दे का एक राजनीतिक पहलू भी है। केंद्र शासित प्रदेश बने रहने से केंद्र सरकार का प्रशासनिक प्रभाव कहीं अधिक बना रहता है। इसके अलावा, उपराज्यपाल (एल.जी.) के माध्यम से प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण रहने से सुरक्षा संबंधी निर्णय तेजी से लिए जा सकते हैं तथा सेना, अद्र्धसैनिक बलों, खुफिया एजैंसियों और पुलिस के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित होता है।

दरअसल, सवाल यह भी है कि जब मौजूदा व्यवस्था स्थिरता बनाए रखने और अलगाववादी राजनीति पर नियंत्रण रखने में केंद्र की मदद कर रही है, तो वह अपने अधिकार क्यों छोड़े? भाजपा के लिए फिलहाल प्रशासनिक नियंत्रण का महत्व, राज्य का दर्जा बहाल करने के प्रतीकात्मक महत्व से कहीं अधिक है। राज्य का दर्जा बहाल होने का अर्थ होगा कि निर्वाचित सरकार के साथ सत्ता सांझी करनी पड़ेगी, जो शासन, कानून-व्यवस्था और कश्मीर से जुड़े राजनीतिक विमर्श जैसे मुद्दों पर दिल्ली से अलग राय रख सकती है। इसके अतिरिक्त, इस मुद्दे को टालने की कोई स्पष्ट चुनावी कीमत भाजपा को चुकानी पड़ती नहीं दिख रही। जम्मू-कश्मीर के बाहर पार्टी के अधिकांश समर्थकों के लिए अनुच्छेद 370 का निरसन ही सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा था, राज्य का दर्जा कब बहाल होगा, यह नहीं। इसके विपरीत, यदि राज्य का दर्जा बहाल होने के बाद निर्वाचित सरकार नई दिल्ली की मुखर आलोचक बन जाती है अथवा सुरक्षा स्थिति फिर से बिगड़ती है, तो उसके राजनीतिक दुष्परिणाम भाजपा और केंद्र सरकार दोनों को भुगतने पड़ सकते हैं।

दूसरी ओर, जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार के लिए राज्य का दर्जा केवल प्रतीकात्मक महत्व का विषय नहीं है। यह इस मूल प्रश्न से जुड़ा है कि राजनीतिक शक्ति, वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक नियंत्रण का अंतिम अधिकार किसके पास होगा? वर्तमान व्यवस्था में वास्तविक अधिकार अभी भी नई दिल्ली के हाथों में केंद्रित है। कानून-व्यवस्था, पुलिस तथा लोक प्रशासन जैसे महत्वपूर्ण विषय उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में हैं। कश्मीरी नेताओं का तर्क है कि वे जनता के प्रति जवाबदेह तो हैं लेकिन उनके पास वे अधिकार नहीं हैं जो सामान्यत: किसी राज्य सरकार को प्राप्त होते हैं। विधानसभा चुनाव के दौरान उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नैशनल कॉन्फ्रैंस ने राज्य का दर्जा बहाल कराने के मुद्दे को प्रमुख चुनावी वादा बनाया था। यदि वह इस वादे को पूरा नहीं कर पाती, तो पीपुल्स डैमोक्रेटिक पार्टी (पी.डी.पी.) उसे केंद्र सरकार की कठपुतली और शक्तिहीन सरकार बताकर राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास करेगी। उमर अब्दुल्ला सरकार की सबसे बड़ी शिकायतों में से एक यह भी है कि नौकरशाही निर्वाचित मंत्रियों की अपेक्षा उपराज्यपाल और केंद्रीय गृह मंत्रालय के प्रति अधिक जवाबदेह महसूस करती है। राज्य का दर्जा बहाल होने पर प्रशासनिक तंत्र पर मंत्रिपरिषद की पकड़ कहीं अधिक मजबूत होगी। 

इस पूरे विवाद के केंद्र में दोनों पक्षों के बीच गहरा अविश्वास भी मौजूद है। कांग्रेस हो या भाजपा, लगभग सभी केंद्रीय सरकारों ने समय-समय पर कश्मीर के राजनीतिक नेतृत्व को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना और उस पर लोकतांत्रिक व्यवस्था का लाभ उठाते हुए अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा देने के आरोप लगाए। वहीं कश्मीरी राजनीतिक दलों का आरोप रहा है कि नई दिल्ली ने निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त करने, राज्यपाल शासन लगाने और राजनीतिक हस्तक्षेप के माध्यम से लोकतांत्रिक संस्थाओं को बार-बार कमजोर किया है। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि केंद्र सरकार लगातार यह दावा करती है कि जम्मू-कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव संपन्न हुए हैं, आतंकवाद में कमी आई है, निवेश बढ़ रहा है, आधारभूत संरचना का तेजी से विकास हो रहा है और राष्ट्रीय मुख्यधारा में एकीकरण की प्रक्रिया सफल रही है, तो फिर राज्य का दर्जा बहाल करने में लगातार विलंब उसके अपने ही दावों से मेल नहीं खाता। 

स्पष्ट है कि ‘उचित समय’ अब एक ऐसी राजनीतिक प्रतिबद्धता बन चुका है, जिसकी कोई निश्चित समय-सीमा या पारदर्शी एवं मापनीय कसौटी निर्धारित नहीं है। राज्य का दर्जा कब बहाल होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि शेष सुरक्षा जोखिमों और पूर्ण लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के पक्ष में दिए जा रहे तर्कों के बीच किसे अधिक महत्व दिया जाता है? ऐसे में सभी पक्षों को राजनीतिक सुविधा की बजाय सुरक्षा, सुशासन और संस्थागत स्थिरता जैसे वस्तुनिष्ठ मानदंडों पर आधारित एक स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध रोडमैप तैयार करना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।-पूनम आई. कौशिश     

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