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बच्चों को सोशल मीडिया के खतरों से बचाएं

यह एक ऐसा सवाल है जो वर्षों से देश की सामूहिक चेतना को झकझोर रहा है-क्या भारत को बच्चों की सुरक्षा के लिए सोशल मीडिया तक पहुंच को प्रतिबंधित करना चाहिए? डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर प्रतिबंध लगाने के लिए वैश्विक स्तर पर प्रयास तेज हो रहे हैं, जहां उपयोगकत्र्ता आपस में बातचीत और सामग्री सांझी कर सकते हैं, ऐसे में हम इस नीतिगत विचार को नजरअंदाज नहीं कर पाएंगे। ऑस्ट्रेलिया द्वारा 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया तक पहुंच पर प्रतिबंध लगाने के 6 महीने से भी कम समय में, कनाडा और ब्रिटेन भी उन देशों की सूची में शामिल होने वाले हैं, जिन्होंने या तो आयु सीमा लागू कर दी है या इस पर विचार कर रहे हैं। 

शायद भारतीय राज्यों को अपने नियम बनाने की छूट दी जा सकती है, जैसा कि कर्नाटक और आंध्र प्रदेश ने किया है। लेकिन पूरे देश में समान रूप से लागू होने वाला एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार करने में कुछ लाभ हो सकता है। आलोचक इसे एक व्यर्थ प्रयास, सत्ता के केंद्रीकरण का एक और उदाहरण, एक पहचान-जोडऩे वाला अभ्यास, जो सभी उपयोगकत्र्ताओं को गोपनीयता के जोखिमों में डाल देगा, आदि के रूप में देख सकते हैं। लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए, संभावना है कि आज हम आयु सीमा पर पहले से कहीं अधिक सर्वसम्मति देखेंगे।

समस्या यह है कि अब तक इस बात के बहुत कम प्रमाण मिले हैं कि इस तरह के प्रतिबंध अपने उद्देश्य की पूर्ति करते हैं, जबकि सोशल मीडिया तक पहुंच के लाभ स्पष्ट हैं। यह सीखने और संवाद को सक्षम बनाता है, शिक्षा का लोकतंत्रीकरण करता है और युवाओं को अपनेपन की भावना प्रदान कर सकता है। दूसरी ओर, यह बच्चों को साइबर-बुलिंग, धमकी, ऑनलाइन यौन शोषण और अन्य अपराधों जैसे जोखिमों से अवगत कराता है और मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि अब के रिकॉर्ड बताते हैं कि ये प्लेटफॉर्म लत लगाने वाले हो सकते हैं। 

कोई देश सोशल मीडिया तक पहुंच के लाभ और हानियों के बीच संतुलन कैसे बना सकता है? संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने हाल ही में सरकारों और तकनीकी कंपनियों से बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए ‘और अधिक तेजी से’ कदम उठाने का आग्रह करते हुए 10 सूत्रीय ढांचा जारी किया है, जिसके अनुसार नाबालिगों को ऐसे प्लेटफॉर्म से प्रतिबंधित करना उन्हें पहले से ही सुरक्षित बनाने का विकल्प नहीं है। पिछले महीने के अंत में, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त वोल्कर तुर्क ने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बच्चों को जिन खतरों का सामना करना पड़ता है, नशे की लत लगाने वाली डिजाइन सुविधाओं से लेकर गोपनीयता के उल्लंघन तक, वे अपरिहार्य नहीं हैं, बल्कि इन प्लेटफॉर्मों की मालिक कंपनियों द्वारा लिए गए व्यावसायिक निर्णयों का परिणाम हैं।

हालांकि, यह उम्मीद करना अवास्तविक है कि प्लेटफॉर्म के मालिक व्यापक जनहित के लिए लाभ छोड़ देंगे। ऐसा तभी संभव है जब दुनिया भर की सरकारें मिलकर दबाव डालें। जब तक ऐसा नहीं होता और व्यवसायों को सुधार करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता, क्या नीति निर्माताओं को चुपचाप बैठे रहना चाहिए? या क्या उनका यह दायित्व है कि वे वह करें जो किया जा सकता है, भले ही इसका मतलब ऐसे प्रतिबंध लगाना हो, जो वे जानते हैं कि कम से कम अपूर्ण ही होंगे?

जनवरी में संसद में प्रस्तुत आॢथक सर्वेक्षण में, मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर उम्र आधारित सीमा लगाने के पक्ष में पुरजोर तर्क दिए और उपयोगकत्र्ताओं को ऑनलाइन बनाए रखने के उनके तरीके को ‘शोषणकारी’ बताया। हालांकि, इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। बेशक, उम्र सीमा लागू करना एक चुनौती होगी लेकिन यह संभव है।

प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ भारत के आधार डाटाबेस से लिए गए आयु टोकन को प्रवेश पास के रूप में उपयोग करने का सुझाव देते हैं, जो उपयोग के बाद नष्ट हो जाते हैं और गोपनीयता संबंधी ङ्क्षचताओं को दूर रखते हैं। प्रस्ताव चाहे जो भी हो, हमें इस मामले पर निर्णय लेना होगा। एक आदर्श समाधान की तलाश में, क्या हमें बेहतर को अच्छे का दुश्मन बनने देना चाहिए? या क्या हमें भी कुछ देशों की तरह न्यूनतम आयु सीमा अनिवार्य करनी चाहिए और इसे लागू करने के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए? तेजी से, दूसरा विकल्प सबसे कम बुरा प्रतीत होता है।

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