लेख

वास्तविक लोकतंत्र केवल बहुमत की जीत का नाम नहीं

देश अपनी स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में प्रवेश कर गया  है। यह वह अवसर है जब सभी भारतीय अपने मतभेदों से ऊपर उठकर उन स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, जिनके अथक संघर्ष और बलिदान ने हमें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से मुक्ति दिलाई। यही वह ऐतिहासिक क्षण था जब एक पराधीन राष्ट्र ने स्वतंत्रता प्राप्त कर अपनी ‘नियति से साक्षात्कार’ की यात्रा आरम्भ की और लंबे समय तक दमन झेलने वाली  जनता ने स्वतंत्रता और सम्मान के अपने अधिकार को प्राप्त किया। तब से आज तक हमने एक लंबा सफर तय किया है।  इस दौरान हमने धार्मिक, जातीय और क्षेत्रीय मतभेदों के साथ-साथ आर्थिक असमानताओं जैसी अनेक चुनौतियों का सामना किया है। हमने युद्ध, आतंकवाद, अकाल और महामारी जैसी कठिन परिस्थितियां भी देखी हैं। इसके बावजूद आज हम विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों, रक्षा और परमाणु क्षमता, मजबूत अर्थव्यवस्था तथा विश्व व्यवस्था को नई दिशा देने में अपनी अग्रणी भूमिका पर गर्व कर सकते हैं।

लेकिन यदि हम एक  लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में अपनी यात्रा का निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक समावेशी और संवेदनशील समाज बनाने के हमारे लक्ष्य के सामने आज भी गंभीर चुनौतियां मौजूद हैं। किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति पर दोषारोपण किए बिना और  देश की उपलब्धियों  को कमतर आंके बिना हमें यह विचार करना होगा कि क्या पिछले दशकों की राजनीति नागरिकों के बीच भाईचारे की भावना को वास्तव में मजबूत कर सकी है। बढ़ती आर्थिक असमानता और सांप्रदायिक तनाव ने समाज के बड़े वर्गों  को अपने ही देश में अलग-थलग और उपेक्षित महसूस करने के लिए मजबूर कर दिया है। आज ऐसी राजनीतिक संस्कृति विकसित होती दिखाई दे रही है जिसमें विरोधियों को हर संभव तरीके से दबाने का प्रयास किया जाता है, विचारों के आधार पर असहमति रखने वालों को अपमानित करने के लिए सोशल मीडिया पर लगातार निशाना बनाया जाता है, उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल किया जाता है और उनके परिवारों तक को निशाना बनाया जाता है। यह स्थिति राजनीति को जनसेवा का सर्वोच्च माध्यम मानने की अवधारणा पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। 
स्पष्ट है कि वास्तविक लोकतंत्र केवल बहुमत की जीत का नाम नहीं है। उसका मूल उद्देश्य न्याय, स्वतंत्रता और मानव गरिमा की रक्षा करना है, जो हमारे संविधान के सर्वोच्च मूल्यों में शामिल हैं। संवैधानिक संस्थाओं द्वारा अपने दायित्वों के निर्वहन में मिला-जुला प्रदर्शन भी देश में लोकतांत्रिक कमी का एक कारण बना है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षक और संविधान के प्रहरी के रूप में सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका हाल के वर्षों में लगातार चर्चा और समीक्षा का विषय रही है। कुछ मामलों में न्यायालय ने, जैसा कि वर्षों पहले  तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश कानिया ने सावधान  किया था, ‘औपचारिक  या नीरस विधिक  दृष्टिकोण’  को अपनाते  हुए बिना मुकद्दमे के आरोपियों  की लंबी अवधि तक हिरासत को उचित  ठहराया है। अपने आदेशों का प्रभावी पालन सुनिश्चित न कर पाना और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित करने वाले मीडिया ट्रायल के प्रति पर्याप्त संवेदनशीलता न दिखाना भी न्यायालय की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है। 

एक उत्तरदायी लोकतंत्र तभी फल-फूल  सकता है, जब समाज समावेशी हो और उसका मार्गदर्शन ऐसे नैतिक मूल्यों से हो, जो केवल सत्ता की व्यावहारिक राजनीति से ऊपर उठकर सबके हित को प्राथमिकता दें। उद्देश्यपूर्ण और आदर्शों से प्रेरित राजनीति के लिए ऐसा सामाजिक वातावरण आवश्यक है, जहां अंतरात्मा की आवाज प्रभावी हो और आदर्शवाद को अव्यावहारिक कल्पना कहकर खारिज न किया जाए। इसलिए अब यह जिम्मेदारी ‘हम भारत के लोगों’ की  है  कि हम संकीर्ण पहचान और विभाजनों से ऊपर उठकर ऐसी व्यापक राजनीतिक नैतिकता को स्थापित करें, जिसकी जड़ें नैतिक मूल्यों में हों और जो संविधान के सर्वोच्च आदर्श सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को अपना मार्गदर्शक बनाए।

इतिहास के अनुभवों से सीख लेकर और विवेक के बल पर हमें, एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिकों के रूप में, यह सुनिश्चित करना होगा कि लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के उद्देश्य से स्थापित हमारा लोकतंत्र किसी भी प्रकार के अन्याय के प्रति मौन सहमति के कारण कमजोर न पड़ जाए। हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति हमारा ऋण हमें इस ऐतिहासिक मोड़ पर यह पुकारता है कि हम ऐसे निर्णय लें, जो हमें इतिहास के सही पक्ष- स्वतंत्रता, न्याय और सबके समान अधिकारों के पक्ष में खड़ा करें। अब समय आ गया है कि हम अपने भय पर विजय प्राप्त करें, अपनी स्वतंत्रता को फिर से सशक्त बनाएं और अपनी राजनीति को ऐसे सम्मान और नैतिकता पर आधारित करें, जहां सत्ता से अधिक महत्व सिद्धांतों का हो।-अश्वनी कुमार

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