दक्षिण एशिया के लिए अगला बड़ा अवसर है खाद्य प्रसंस्करण

दक्षिण एशिया खाद्य प्रणालियों की अपनी यात्रा में एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। समृद्ध कृषि-जैव विविधता वाला एक प्रमुख क्षेत्र होने के बावजूद, खेत से उपभोक्ताओं तक पहुंचने की प्रक्रिया में अब तक बहुत अधिक कीमत कम हो जाती है, जो किसानों, रोजगार और पोषण के लिए एक छूटा हुआ अवसर है।
भारत इस विरोधाभास का एक स्पष्ट उदाहरण पेश करता है। खाद्य और कृषि संगठन (एफ.ए.ओ.) के अनुसार, भारत दुनिया का दूध और दालों का सबसे बड़ा उत्पादक है और फलों तथा सब्जियों का दूसरा सबसे बड़ा। इसके बावजूद, कटाई के बाद की प्रक्रियाओं, भंडारण, लॉजिस्टिक्स और प्रसंस्करण में कमियों के कारण खाद्य पदार्थों का काफी मात्रा में नुकसान होता रहता है। यह सतत् विकास लक्ष्यों सहित वैश्विक विकास प्राथमिकताओं की ओर प्रगति में बाधा डालता है। यह न केवल एक अक्षमता है, बल्कि एक छूटे हुए अवसर को भी दर्शाता है। बर्बाद हुआ हर एक टन खाद्य किसानों के लिए खोई हुई आय, युवाओं के लिए खोए हुए रोजगार के अवसर और परिवारों के लिए खोए हुए पोषण का प्रतीक है। इसलिए इन नुकसानों को मूल्य में बदलना अब एक क्षेत्रीय प्राथमिकता बन जाना चाहिए। खाद्य प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन कृषि की संभावनाओं का पता लगाने की कुंजी है। यह खेतों को बाजारों से, किसानों को उद्योगों से और स्थानीय उत्पादन को क्षेत्रीय और वैश्विक वैल्यू शृंखलाओं से जोड़ता है। इस प्रकार, यह कृषि और व्यापक आॢथक परिवर्तन के बीच एक महत्वपूर्ण पुल के रूप में कार्य करता है।
मात्रा से मूल्य की ओर : वर्तमान में भारत में, कृषि उपज का केवल 17 प्रतिशत हिस्सा ही प्रसंस्कृत (प्रोसैस) किया जाता है। क्षेत्र की पूरी आर्थिक क्षमता का लाभ उठाने के लिए, 2030 तक इस हिस्से को लगभग 25 प्रतिशत तक बढ़ाना आवश्यक है। इसके साथ ही, कटाई के बाद के खाद्य नुकसान को कम करना और प्रसंस्करण से संबंधित बुनियादी ढांचे को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अर्थव्यवस्था के भीतर अधिकतम आॢथक मूल्य बरकरार रखा जाए। खाद्य प्रसंस्करण उत्पादों की शैल्फ लाइफ, खाद्य सुरक्षा को बढ़ावा देता है और नए व घरेलू निर्यात बाजारों तक पहुंच के अवसर खोलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उत्पादक देशों के भीतर आथिक मूल्य के बड़े हिस्से को बरकरार रखने में मदद करता है, जिससे किसानों, उद्यमों और ग्रामीण समुदायों को सीधा लाभ मिलता है।
बाजार आधारित मूल्य शृंखलाओं को आकार देना : दक्षिण एशिया की समृद्ध कृषि-जैव विविधता उच्च मूल्य वाले उत्पादों के विकास के लिए अपार संभावनाएं प्रदान करती है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब वैश्विक मांग अधिक विविध पौष्टिक और विशेष खाद्य उत्पादों की ओर बढ़ रही है। इसके अलावा, डिजिटल समाधान ट्रेसेबिलिटी को मजबूत, गुणवत्ता मानकों में सुधार करने और लगातार जटिल होते वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसमें सार्वजनिक निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका है लेकिन साथ ही निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। भारत ने इस दिशा में पहले ही प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों का औपचारिकीकरण योजना और उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (पी.एल.आई.) योजना जैसी प्रमुख योजनाओं के माध्यम से खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के लिए इस दिशा में आवश्यक कदम उठाए हैं।
रोजगार के अवसर वहीं, जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत : खाद्य प्रसंस्करण केवल आॢथक दक्षता के बारे में नहीं, यह आजीविका से भी जुड़ा हुआ है। पूरे दक्षिण एशिया में लाखों युवा हर वर्ष श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं, जबकि अकेला कृषि क्षेत्र अब इस बढ़ते कार्यबल को खपाने में सक्षम नहीं है। इस संदर्भ में खाद्य प्रसंस्करण एक प्रभावी समाधान पेश करता है। उत्पादन केंद्रों के करीब उद्योगों की स्थापना करके यह लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग, खाद्य प्रौद्योगिकी और संबंधित सेवाओं के क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत रोजगार के अवसर पैदा करता है।
वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मकता : जिस तरह नए व्यापार समझौते बाजार के अवसर पैदा कर रहे हैं, ऐसे में अब ध्यान कच्चे कृषि उत्पादों के निर्यात से हटकर उच्च मूल्य वाले प्रसंस्कृत उत्पादों के निर्यात की ओर केंद्रित होना चाहिए। वैश्विक उपभोक्ता अब ऐसे खाद्य पदार्थों की मांग कर रहे हैं, जो सुरक्षित, पौष्टिक, ट्रेस करने योग्य और टिकाऊ रूप से उत्पादित हों। इससे गुणवत्ता, मानकों और नवाचार का महत्व और बढ़ जाता है-ये ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें भारत अपनी क्षमताओं को निरंतर मजबूत कर रहा है।
दक्षिण एशिया के लिए एक अवसर : यह केवल किसी एक देश के बारे में नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के साथ मिलकर आगे बढऩे का अवसर है। दक्षिण एशियाई देश सांझा चुनौतियों-खंडित आपूॢत शृंखलाओं, सीमित प्रसंस्करण क्षमता और कटाई के बाद होने वाले उच्च स्तर के खाद्य नुकसान का सामना कर रहे हैं, हालांकि, ये सांझी बाधाएं सांझा समाधानों के लिए अवसर भी पैदा करती हैं। उत्पादन और नीतिगत नवाचार दोनों में अग्रणी होने के नाते भारत को इस क्षेत्रीय बदलाव को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।-चिराग पासवान




