व्यापार समझौतों में जान फूंकेंगे नए श्रम कानून

इन दिनों भारत की अर्थव्यवस्था से संबंधित वैश्विक आर्थिक संगठनों की रिपोर्टों में दो बातें रेखांकित हो रही हैं। एक, पश्चिम एशिया संकट के कारण देश की विकास दर में तेजी से गिरावट आ रही है। दो, भारत के तेजी से बढ़ते द्विपक्षीय व्यापार समझौतों और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को भारत के हित में अधिक लाभप्रद बनाने के मद्देनजर हाल ही में गजट अधिसूचना के माध्यम से पूरे देश में जमीनी स्तर पर लागू की गई चार नई श्रम संहिताएं (लेबर कोड) जान फूंकते हुए दिखाई दे सकेंगी। इन चार श्रम संहिताओं- मजदूरी संहिता, औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा संहिता के तहत नए सरल श्रम कानून उद्योग-कारोबार को मजबूती और विकास की नई संभावनाओं को आकार देते हुए दिखाई दे सकेंगे। उल्लेखनीय है कि इस समय वैश्विक अनिश्चितता और पश्चिम एशिया संकट के कारण घटती हुई विकास दर को थामने तथा विकास दर को बढ़ाने के मद्देनजर भारत द्विपक्षीय व्यापार समझौतों और एफटीए की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में 22 मई को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स के बीच द्विपक्षीय वार्ता के दौरान वर्ष 2029 तक द्विपक्षीय व्यापार दोगुना करने की प्रतिबद्धता जताई गई है। पिछले एक दशक में साइप्रस से भारत में निवेश लगभग दोगुना हुआ है। इसी तरह पिछले दिनों 15 से 20 मई तक प्रधानमंत्री मोदी ने पांच देशों- संयुक्त अरब अमीरात, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली की आधिकारिक यात्रा के दौरान इन देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार के महत्वपूर्ण समझौते किए हैं।
इनमें सेमीकंडक्टर, ऊर्जा, रक्षा और क्रिटिकल मिनरल्स पर समझौते प्रमुख हैं। प्रधानमंत्री मोदी के साथ वार्ता के दौरान इन देशों की 50 बड़ी वैश्विक कंपनियों के मुख्य कार्यपालक अधिकारियों (सीईओ) के द्वारा भारत में अपनी व्यापार विस्तार योजनाओं के लिए लगभग 40 अरब डॉलर की राशि का निवेश संकल्प जताया गया है। यह भी महत्वपूर्ण है कि इस यात्रा के दौरान 19 मई को ओस्लो में संपन्न भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन यूरोप के नॉर्डिक क्षेत्र के साथ भारत के रिश्तों को व्यापक बनाने के मामले में अहम रहा है। नॉर्डिक देशों में उत्तरी यूरोप के डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन जैसे देश शामिल हैं। अब भारत इनके साथ पारंपरिक कूटनीतिक रिश्तों के बजाय गहन रणनीतिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रहा है। नार्डिक देशों की कई बड़ी कंपनियों में से कई कंपनियां पहले से ही भारत में काफी अधिक निवेश कर चुकी हैं और उनका भारत में कुल निवेश लगभग 180 अरब डॉलर के आसपास है। नार्डिक देशों ने अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है और इसके बदले में भारत ने इन देशों की रक्षा कंपनियों को रक्षा उद्योग गलियारे में 100 फीसदी विदेशी निवेश पहुंच प्रदान करना सुनिश्चित किया है। उल्लेखनीय है कि भारत एफटीए की डगर पर भी तेजी से बढ़ रहा है। पिछले माह 27 अप्रैल को भारत और न्यूजीलैंड के बीच एक ऐतिहासिक एफटीए पर हस्ताक्षर हुए हैं। न्यूजीलैंड के साथ किए गए इस एफटीए का अत्यधिक मजबूत पक्ष भारत से सेवा निर्यात बढ़ाना और भारत से पेशेवरों को न्यूजीलैंड में अच्छे अवसरों के लिए आगे बढ़ाना भी है। यह एफटीए भारत की प्रतिभाओं, स्टार्टअप्स और नवाचार के लिए एक मजबूत बुनियाद प्रदान करता है। यह भी महत्वपूर्ण है कि पिछले वर्ष 2025 में भारत के द्वारा ब्रिटेन और ओमान के साथ किए गए एफटीए का भी इसी वर्ष 2026 में आगामी महीनों में कार्यान्वयन शुरू होगा।
साथ ही भारत-यूरोपीय संघ एफटीए का क्रियान्वयन भी इसी वर्ष संभावित है। इस समझौते को सभी समझौतों की जननी कहा गया है। अब मॉरीशस, संयुक्त अरब अमीरात, ऑस्ट्रेलिया और चार यूरोपीय देशों आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे और लिकटेंस्टाइन के समूह यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (एफ्टा) के साथ सफलतापूर्वक कार्यान्वित हो रहे एफटीए के और अधिक लाभ मिलते हुए दिखाई देंगे। इतना ही नहीं, कनाडा, इजरायल, रूस, पेरू, चिली, दक्षिण अफ्रीका और मेक्सिको के साथ मुक्त व्यापार समझौतों पर काम में तेजी आएगी। निश्चित रूप से भारत के बढ़ते हुए व्यापार समझौतों के अत्यधिक सकारात्मक परिदृश्य के बीच भारत में लागू नए सरल श्रम कानूनों की नई लाभप्रद अहमियत दिखाई दे रही है। नए श्रम कानूनों से व्यापार समझौतों का प्रभावी रूप से लाभप्रद क्रियान्वयन होगा। नए श्रम कानूनों से श्रमिकों की सुरक्षा में वृद्धि और बेहतर रोजगार ढांचे के लिए नियमों का आधुनिकीकरण उभर कर दिखाई दे रहा है। वहीं इनसे उद्योग-कारोबार को रफ्तार मिलेगी। ये श्रम कानून देश में स्वतंत्रता के बाद से सबसे व्यापक और प्रगतिशील श्रम-उन्मुख सुधार हैं। ये नई श्रम संहिताएं सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा, न्यूनतम और समय पर मजदूरी का भुगतान, सुरक्षित कार्यस्थल और नारी शक्ति व युवा शक्ति के लिए लाभकारी अवसरों के लिए एक मजबूत नींव के रूप में काम करेंगी। साथ ही भविष्य के लिए एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करेंगी, जो श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा। नि:संदेह नई श्रम संहिताओं ने श्रम नियमों को सरल, निष्पक्ष और नए दौर के कामकाजी वातावरण के अधिक अनुकूल बना दिया है। ये नई संहिताएं श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा करने, सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा में सुधार करने, व्यवसायों के लिए नियमों का अनुपालन करना आसान बनाने और बढ़ती अर्थव्यवस्था में अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने के मद्देनजर अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। नई श्रम संहिताओं के तहत श्रमिकों, उद्योगों और सरकार के हितों से संबंधित बहुआयामी लाभ उभरकर दिखाई दे रहे हैं।
अब नियोक्ताओं को सभी श्रमिकों को नियुक्ति पत्र जारी करना होगा तथा गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों सहित पूरे श्रमबल को सामाजिक सुरक्षा कवरेज प्रदान करना होगा। न्यूनतम मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित करने और 40 वर्ष से अधिक आयु के श्रमिकों के लिए मुफ्त वार्षिक स्वास्थ्य जांच प्रदान की जाना भी सुनिश्चित की गई है। अब तय अवधि के लिए ठेके पर काम करने वाले कामगारों को स्थायी श्रमिकों के बराबर सभी लाभ मिलेंगे और वे 5 साल के बजाय सिर्फ एक साल बाद ग्रेच्युटी पाने के हकदार होंगे। नए श्रम नियम महिलाओं को रात की पाली में काम करने और देश भर में कर्मचारियों के राज्य बीमा लाभों का विस्तार करने की अनुमति भी देते हैं। इन सबसे श्रम की गुणवत्ता और उत्पादकता बढ़ेगी। अब आत्मनिर्भरता और स्वदेशी को नए श्रम कानून तेजी से आगे बढ़ा सकेंगे।
साथ ही नई श्रम संहिताओं से देश सेवा क्षेत्र के साथ-साथ मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ेगा। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि नए श्रम कानूनों से सेवा निर्यात में भी वृद्धि होते हुए दिखाई देगी। दुनिया में इस समय अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के नवीनतम विश्व आर्थिक परिदृश्य में प्रकाशित सेवा निर्यात से संबंधित अध्ययन रिपोर्ट भी रेखांकित हो रही है। इसमें कहा गया है कि हाल के दशकों में भारत से सेवाओं का निर्यात वस्तुओं की तुलना में कहीं तेजी से बढ़ा है। ये ऐसी सेवाएं हैं जिन्हें बिना भौतिक निकटता के सीमाओं के पार पहुंचाना आसान है। साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म, क्लाउड कंप्यूटिंग और रिमोट वर्क ने कई सेवाओं को व्यापार योग्य बना दिया है। जैसे-जैसे दूरी का महत्त्व कम होता जा रहा है और डिजिटल व्यापार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे भारत से सेवाओं का निर्यात बढ़ रहा है। वैश्विक सेवाओं के निर्यात में भारत की हिस्सेदारी वर्ष 2005 में 1.9 फीसदी से बढक़र इस वर्ष 2025-26 में करीब 4.3 फीसदी हो गई है।-डा. जयंती लाल भंडारी




