अंतर्राष्ट्रीय

कनाडा अपने स्वाभिमान की कीमत पर कोई समझौता नहीं करेगा

कनाडा इन दिनों इतिहास की सबसे बड़ी आॢथक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। अमरीका के साथ व्यापार वार्ता का टूटना सिर्फ टैरिफ या बाजार तक पहुंच का विवाद नहीं, यह इस बात की परीक्षा की घड़ी है कि क्या कनाडा भारी आॢथक दबाव के बावजूद अपनी संप्रभुता, अपने श्रमिकों, व्यवसायों और अपनी विशिष्ट पहचान की रक्षा कर सकता है?

प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की सरकार द्वारा उस समझौते को अस्वीकार करना पूरी तरह से सही था, जो कनाडा की स्वतंत्रता से समझौता करता, देश के प्रमुख उद्योगों को कमजोर करता या फ्रैंच भाषा और कनाडाई संस्कृति को नुकसान पहुंचाता। ये चीजें सौदेबाजी के लिए नहीं हैं। ये हमारे देश की पहचान की नींव हैं। कनाडा ने पूरी गंभीरता और नेक नीयत से बातचीत की। लेकिन नेक नीयत से बात करने का अर्थ यह नहीं कि दादागिरी और अन्यायपूर्ण शर्तों को स्वीकार कर लिया जाए। जब अंतिम समय में शर्तें बदल दी गईं और उन्होंने कनाडा की सीमाओं को लांघा, तो सरकार ने बातचीत वहीं रोक दी। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का कहना है कि दोनों देशों के लाभ के लिए व्यापार समझौता अभी भी संभव है लेकिन उसके लिए कनाडा की स्वतंत्रता का सम्मान करना, श्रमिकों का संरक्षण करना और सीमा के दोनों ओर समृद्धि लाना आवश्यक होगा।

प्रधानमंत्री कार्नी के इस जवाब को केवल एक घटना पर दी गई प्रतिक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह उसी सोच का वास्तविक रूप है, जो उन्होंने जनवरी में दावोस में ‘वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम’ में रखी थी। दावोस में कार्नी ने चेतावनी दी थी कि वैश्विक माहौल बड़े उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। व्यापारिक सांझेदारी को कभी सबकी समृद्धि का जरिया माना जाता था लेकिन अब शक्तिशाली देश इसे अन्य देशों पर दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। कार्नी के संबोधन का मुख्य संदेश स्पष्ट था कि ‘मध्यम शक्ति वाले देश किसी बड़ी महाशक्ति की चापलूसी करके अपनी स्वतंत्रता नहीं बचा सकते। उन्हें अपने देश के भीतर खुद को मजबूत करना होगा, व्यापार और निवेश के लिए अन्य देशों के साथ संबंध बढ़ाने होंगे और समान विचारधारा वाले देशों के साथ मिलकर काम करना होगा।’ क्योंकि यदि वे निर्णय लेने वाली मेज पर नहीं बैठेंगे, तो बड़ी शक्तियां उन्हें अपने फायदे का साधन बना लेंगी। 

कार्नी ने वही करके दिखाया है, जो उन्होंने कहा था। उन्होंने आॢथक दबाव के आगे झुकने की बजाय स्वतंत्र निर्णय लेने का रास्ता चुना। उन्होंने दिखाया है कि कनाडा सहयोग के लिए तैयार है लेकिन आॢथक दादागिरी बर्दाश्त नहीं करेगा। उन्होंने यह भी समझा है कि संप्रभुता की रक्षा केवल भाषणों से नहीं होती। इसके लिए आर्थिक मजबूती, राजनीतिक साहस और ऐसे वैश्विक संबंध चाहिएं, जिनसे देश अपने फैसलों पर अडिग रह सके। 

यह सिद्धांत कनाडा को अमरीका से मुंह मोडऩे के लिए नहीं कहता। यह कनाडा को किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर होने के जोखिमों को कम करने की सलाह जरूर देता है। इसका अर्थ है यूरोप, भारत, एशिया-प्रशांत क्षेत्र, ब्रिटेन और अन्य विश्वसनीय सांझेदारों के साथ व्यापार बढ़ाना। इसका अर्थ है देश के भीतर आपूर्ति शृंखला को सशक्त करना, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का समझदारी से विकास करना, प्रांतों के बीच व्यापारिक बाधाओं को दूर करना और कनाडा की तकनीक, विनिर्माण, कृषि तथा बुनियादी ढांचे में निवेश करना। व्यापार विवाद केवल सरकारों के बीच लड़ी जाने वाली सैद्धांतिक लड़ाइयां नहीं होते। इनका सीधा असर स्टील श्रमिकों, ऑटोमोबाइल कर्मचारियों, किसानों, वानिकी कामगारों, छोटे व्यापारियों और पहले से ही महंगाई से जूझ रहे परिवारों पर पड़ता है। इसलिए कनाडा के जवाबी कदम बेहद नपे-तुले होने चाहिएं और इससे प्रभावित श्रमिकों व व्यवसायों को पूर्ण सहायता मिलनी चाहिए। 

सरकार ने $27.6 अरब के अमरीकी सामानों पर जवाबी शुल्क लगाने की घोषणा की है, जो 8 सितम्बर से प्रभावी होगा। इसके साथ ही कनाडाई श्रमिकों और व्यवसायों की सहायता के लिए 7.5 अरब डालर के नए राहत पैकेज की भी घोषणा की गई है। यह सहायता अत्यंत आवश्यक होगी। सरकारों को वित्तीय सहायता, रोजगार समर्थन, कौशल विकास और नए बाजार तलाश रहे व्यवसायों की मदद करनी चाहिए। इसके साथ ही कनाडा के नागरिक भी जहां तक संभव हो, कनाडा में निर्मित वस्तुएं खरीद कर, स्थानीय व्यवसायों का समर्थन करके और देश की आॢथक शक्ति को राष्ट्रीय संप्रभुता का हिस्सा मानकर अपना योगदान दे सकते हैं।

व्यापार वार्ताओं के दौरान कनाडाई संस्कृति और फ्रैंच भाषा के संरक्षण को गौण मुद्दा नहीं माना जा सकता। कनाडा केवल अमरीका के उत्तर में स्थित कोई बाजार नहीं है। हम अपने संविधान, दो आधिकारिक भाषाओं, मूलनिवासी समुदायों, संस्थाओं, इतिहास और विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान वाला एक संप्रभु राष्ट्र हैं। फ्रैंच भाषा के अधिकारों की रक्षा भी कनाडा के संस्थागत ढांचे और राष्ट्रीय एकता के लिए उतनी ही अनिवार्य है। 
करों, सहायता कार्यक्रमों और वार्ता की रणनीतियों पर बहस हो सकती है और संसद की निगरानी भी रहनी चाहिए लेकिन दलगत राजनीति के कारण कनाडा का राष्ट्रीय पक्ष कमजोर नहीं पडऩा चाहिए। राजनीतिक दलों के घरेलू मुद्दों पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन बाहरी आॢथक दबावों के विरुद्ध सभी को एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए।-मनिंदर सिंह गिल

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